#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ९७- दि. २९.०८.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ९७ : दि. २९.०८.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
उत्तरार्ध - १ :
द्रौपदी तेजस्विनी थी, विदुषी और वाक्पटु थी, वह सौंदर्यवती थी। द्रौपदी के गुणों की और सौंदर्य की किर्ती से आकर्षित अनेक राजा व राजकुमार उसे स्वयंवर में प्राप्त करने की मनिषा से पधारे थे।
पांचालराज द्रुपद के परिवार से श्रीकृष्ण के आत्मीय संबंध थे।
स्वयं द्रौपदी और श्रीकृष्ण के संबध भी मैत्रीपूर्ण थे। दोनो की एकदूसरे के प्रति भावनाएँ आदर और सरल - निश्छल प्रेम की थी। द्रौपदी के सखा थे श्रीकृष्ण !
यह एक ऐसा संबध था जिसमें द्रौपदी अपने मन की उथलपुथल, अपने प्रश्न और समस्याएँ, अपने सभी भावनिक आंदोलन श्रीकृष्ण के सम्मुख रख सकती थी।
श्रीकृष्ण के मत, विचार और उनका उपदेश राजा द्रुपद और द्रौपदी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हुआ करता था।
हम किसी के मन की बात नहीं जानते हैं, और उस युग के व्यक्तियों के संबध में तो नहीं ही जानते हैं, इसलिए मात्र तर्क किया जा सकता हैं।
पांचालराज द्रुपद के परिवार के साथ श्रीकृष्ण के संबध और श्रीकृष्ण के प्रति उनके मन में प्रेम व आदर की जो मधुर भावना थी उस कारण यह संभावना भी हो सकती हैं कि द्रुपद अपनी कन्या का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर अति प्रसन्न होते।
परंतु द्रौपदी जैसी अनुपम सुंदरी विदुषी के लिए भी श्रीकृष्ण के मन में वैसा कोई मोह नहीं था। श्रीकृष्ण ने स्वयं के लाभ की दृष्टी से कभी सोचा ही नहीं हैं, उनका दृष्टीकोण स्वार्थ से परे और व्यापक समाजहित से प्रेरित हैं !
उन्होने पांडवों को एकत्रित रखने के सूत्र के रुप में द्रौपदी को देखा। उस युग के भारत में न्याय पर आधारित राज्य बनाने का और अन्यायी राजाओं को नियंत्रण में रखने का / आवश्यकता के अनुसार उनका पारिपत्य करने का सामर्थ्य यदि किसी में था तो वह केवल पांडव थे। इसलिए श्रीकृष्ण चाहते थे कि उन्हे एकत्र बांधनेवाला रज्जू भी उतना ही दृढ हो और द्रौपदी में वह क्षमता थी।
कदाचित इसीलिए उन्होने राजा द्रुपद से कहकर स्वयंवर की ऐसी शर्त रखवाई की जिसे मात्र अर्जुन पूर्ण कर सकते थे (वैसे इस स्वयंवर में द्रौपदी ने सूतपुत्र से विवाह मान्य ना होने के कारण कर्ण को रोक दिया इसपर आक्षेप तब भी किए गए थे और अभी भी किए जाते हैं। परंतु किसी स्वयंवर में कन्या को अपने लिए पति चुनने के संबध में जो भी अधिकार दिए गए हो उनका तो स्वागत ही होना चाहिए, आक्षेप क्यों हो ?)
कर्ण भी अर्जुन जितने ही श्रेष्ठ धनुर्धर थे, वीर थे यह हम यदाकदा सुनते आए हैं। वास्तविकता यह हैं कि अर्जुन व कर्ण युद्ध में जब भी एक दूसरे के सामने आए हैं तब विजय अर्जुन की ही हुई थी। इस संबध में हम यथासमय चर्चा करेंगे।
उत्तरार्ध - २ : दि. ३०.०८.२०२३ को
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें