#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १४५ - दि. १६.१०.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १४५: दि. १६.१०.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩 

अनेक व्यक्तियों से मिलकर समाज बनता हैं। इसलिए उन व्यक्तियों का चरित्र, उनकी सोच की दिशा और उससे परिचालित होनेवाली कृति का परिणाम समाज के ढाँचे पर होता है।
व्यापक रुप में यह सब राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य को भी प्रभावित करता है।

इसिलिए समाज के घटक मनुष्यों के संस्कार, उनकी विचारधारा और इतिहास से सीख लेकर काल के अनुरूप बदलाव स्वीकार करने की क्षमता उस समाज का भविष्य निश्चित करती है।

हमारे सनातन हिंदु धर्म में मनुष्य को शरीर के तात्कालिक (लघु अवधि के लिए) अस्तित्व के विषय में जागृत रखने का संस्कार अनेक पद्धतियों से किया जाता हैं। अर्थात जो दृश्य हैं वह थोडी अवधि के लिए हैं इसलिए दृश्य से परे जाकर हमें दृष्टि व्यापक करनी चाहिए यह विभिन्न मार्गों से स्पष्ट किया जाता हैं।

पहला उदाहरण हमारी पूजाविधि व पूजा पद्धतियों में देखे जा सकता हैं।
प्रत्येक घर के पूजाघर में धातु की देवमूर्तियाँ स्थायी तौर पर होती है क्योंकि उस स्थान पर नियमित रूप से पूजा अर्चना करने से घर सकारात्मक शक्तियों से संरक्षित होता है और विनाशक शक्तियाँ उस वास्तु से दूर रहती हैं।
इसके साथ ही विभिन्न प्रांतों में ईश्वर की पूजा - आराधना - उत्सव भिन्न - भिन्न रूपों में की जाती है। गणेशस्थापना, गौरी(महालक्ष्मी) स्थापना, नवरात्री, विभिन्न प्रकार के याग जैसे गणेशयाग, सप्तशती होम और अनेक प्रकार की पूजा जैसे कुलदेवता का अभिषेक, सत्यनारायण / सत्यविनायक कथा, मंगलप्रसंग में की जानेवाली शांतिपूजा आदि में देवताओं की मूर्ति / प्रतीक की स्थापना की जाती है और विशिष्ट अवधि पश्चात उनका विसर्जन भी किया जाता है।

मूर्ति / प्रतीक कुछ दिनों के लिए अथवा थोडे समय के लिए स्थापित कर उसका विसर्जन करने से यही सीख दी जाती हैं कि जो दृश्य है (आँखो को दिखता है) वह अदृश्य भी हो जाएगा अर्थात उसका अस्तित्व आँखों को नहीं दिखेगा किंतु उसमे निहित तत्व शाश्वत है इसलिए उसपर श्रद्धा भी शाश्वत रखनी चाहिए। अर्थात मूर्ति / प्रतीक के माध्यम से हमारे मन में भक्तिभाव की पुर्नस्थापना होती हैं जिसे और दृढ करने का संकल्प करना अपेक्षित है।

कई बार यह प्रश्न पूछा जाता हैं कि इस प्रकार त्योहार - उत्सव करने की क्या आवश्यकता हैं क्योंकि इससे आडंबर का महत्व प्रस्थापित होता है। बडी बडी मूर्तियाँ, सजावट, भांति - भांति का भोग चढाना, उस निमित्त प्रसाद वितरण / भोजन कराना इ. में भक्ति कहाँ हैं ?

ऐसे प्रश्न जिज्ञासा के कारण पूछे जा सकते हैं अथवा अज्ञान के कारण अथवा (इसे समझना अति आवश्यक हैं ) भ्रमित करने के लिए !
सनातन हिंदु धर्म प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता देता हैं इसका लाभ उठाकर कुछ असामाजिक तत्व ऐसे अनेक विचारों के बीज डाल देते हैं जिससे कभीकभी धार्मिक व्यक्ति भी भ्रमित हो जाते हैं।

सत्य यह है कि निर्गुण - निराकार ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग अनेक बार सगुण - साकार मूर्तियों से होकर जाता है ! 
इन उत्सवों के निमित्त प्रथम ईश्वर के रूप की मोहिनी मन को व्यापती हैं, धीरे धीरे भक्ती - साधना की ओर मन आकर्षित होता हैं और (गुरु के) मार्गदर्शन से मन निर्गुण - निराकार ईश्वर का सत्य स्वरूप समझने में सक्षम होता हैं।

यह विस्तृत विषय हैं इसलिए इसपर और विचार आवश्यक है🙏🏼

गर्व से कहे 👇🏼 
हिंदु धर्म की जय 🚩 
भारतमाता की जय 🇮🇳

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