#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ११८- दि. १९.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ११८: दि. १९.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
धर्म और धर्मपालन दोनो ही गतिशील है। अर्थात कालानुरूप, प्रसंगानुरूप धर्म की व्याख्या में परिवर्तन होता हैं, हमारे सनातन हिंदु धर्म में तो होता ही हैं। और यह परिवर्तन पूजाविधि, ईश्वरसाधना इ. के साथ मनुष्य के जीवन में उसके धर्मानुसार आचरण को भी लागू होता है।
इसका उत्तम उदाहरण भगवान श्रीकृष्ण का कुरुक्षेत्र पर युद्ध के समय वर्तन हैं !
युद्ध से पूर्व ही उन्होने बता दिया था की वह ना तो शस्त्र उठाएंगे ना ही प्रत्यक्ष युद्ध में भाग लेंगे। ऐसे में कौरव और पाण्डव या तो उन्हे चुन सकते हैं या उनकी नारायणी सेना को !
जहाँ अर्जुन ने तत्काल श्रीकृष्ण को मांग लिया वहीं दुर्योधन नारायणी सेना प्राप्त कर आनंदित हुआ।
कहाँ निःशस्त्र श्रीकृष्ण और कहां उनकी वह बलिष्ठ, प्रशिक्षित, युद्धकुशल और शस्त्रसज्जित सैनिकोंवाली नारायणी सेना !
श्रीकृष्ण ने ना लड़ने की प्रतिज्ञा की थी इसलिए दुर्योधन के विचार में वह निरुपयोगी और अनावश्यक थे। उसके विचार में सैनिकों की संख्या के आधारपर नारायणी सेना उपयुक्त थी।
इस सारे प्रसंग में अर्जुन के मन में कोई द्वंद्व नहीं था। उनके लिए श्रीकृष्ण को पाना ही एकमात्र महत्वपूर्ण बात थी। अर्जुन का मानना था कि श्रीकृष्ण को गंवाकर यदि आप विश्व की अन्य कोई भी वस्तु प्राप्त कर लेते हैं तो उसका महत्व ही नहीं है ! इसलिए अर्जुन ने निहथ्ये, कुरुक्षेत्र के युद्ध में भाग ना लेने की प्रतिज्ञा कर चुके श्रीकृष्ण को मांग लिया और उन्हे सारथि बनने का अनुरोध किया। भक्तवत्सल भगवान ने उसे स्वीकार कर लिया।
वैसे इस उदाहरण से हम मनुष्य की चिंतनप्रक्रिया का उसके व्यक्तित्व और भविष्य पर पडनेवाला प्रभाव भी देख सकते है।
श्रीकृष्ण राजा तो थे नहीं, गोकुल में गोपालों के बीच ही रहे, इसलिए वन में गौवें चराने के लिए ले जाना उनके लिए अत्यंत सामान्य बात थी। आजकल की भाषा में दूधवाले का बच्चा था वह !
मथुरा में आनेपर अपने राजकुल से संबध के विषय में जब उन्हे जानकारी मिली तब भी श्रीकृष्ण पर उसका कोई प्रभाव नहीं हुआ । ग्वाले (दूधवाले) के कुटुंब से होने में उन्हे अपने जीवनभर कभी भी ना आपत्ति हुई ना लज्जा।
दूसरी ओर कर्ण है जो जीवनभर सूतपुत्र (सारथि का पुत्र) होने को अपना दुर्भाग्य मानता रहा। उसके मन में सदा राजकुल अथवा किसी अन्य 'सम्मानित' कुल से ना होने का दुख रहा जिसके चलते वह जीवनभर दुर्योधन द्वारा उसे दिए गए खोखले बडप्पन की बलि चढता गया और उसने अपने जीवन का नाश ही कर लिया !
और एक श्रीकृष्ण हैं जो अर्जुन का सारथि (आज की भाषा में Driver) होने का अनुरोध सहर्ष स्वीकार भी करते हैं और युद्ध में निहित दुर्जनों का विनाश और सत्पक्ष के विजय के लिए अर्जुन को प्रेरित भी करते हैं !
परंतु युद्ध में श्रीकृष्ण ने केवल प्रेरणा नहीं दी थी, जब वैसा प्रसंग आया तब उन्होने अपने सुदर्शन चक्र को हाथ में भी लिया था !
क्यों ?
उन्होने तो शस्त्र ना उठाने की और ना लडने की प्रतिज्ञा की थी, तब वह धर्मच्युत क्यो हुए ?
इसी बात की समझने से हम धर्म की गतिशीलता और परिवर्तन की प्रासंगिकता समझ सकते है।
कौरवों के सेनापती भीष्म थे। परंतु अपने पितामह के प्रति आदर और प्रेम के कारण पाण्डव उनका वध नहीं कर रहे थे। शत्रु के इतने प्रबल और पराक्रमी सेनापति को इस प्रकार जिवित छोडने के कारण पाण्डव सेना नष्ट हो रहीं थी।
पाण्डवों का उनके प्रति आदर व मोह अनुचित नहीं था परंतु भीष्म ने जिस पक्ष को चुना था उसके पराजय के लिए पाण्डवों को अपनी भावनाओं के परे जाकर सोचना अत्यावश्यक था जो वह नहीं कर रहे थे।
भीष्म ने आजीवन ब्रह्मचर्य व राज्यत्याग की प्रतिज्ञाएँ की थी परंतु उसी के साथ उन्होने स्वयं को कुरुओं के सिंहासन की रक्षा के लिए बांध लिया था।
परिस्थितियाँ बदलनेपर भी उन्होने अपने निर्णय पर पुनर्विचार नहीं किया। धृतराष्ट्र लोभी, कामुक और स्वार्थपरायण था तो उसका पुत्र दुर्योधन अत्याचारी भी था। प्रजा पर अन्याय कर रहा था, उसने भरी राजसभा में कुलवधू का वस्त्रहरण किया और असभ्य - भोंडे शब्दों में उसे रति प्रसंग का निमंत्रण दिया, पाण्डवों का राज्य कपट से छीन लिया, युद्ध टालने के लिए दूत के रूप में आए हुए श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का प्रयास किया....
भीष्म फिर भी निष्क्रिय रहे। सभी घटनाओं की अवांछित बिभत्सता देखकर भी उन्होने राजसिंहासन की रक्षा करते रहने का ही निर्णय लिया ! प्रतिज्ञापालन के अहंकार ने उन्हे युद्धक्षेत्र में पाण्डवों के विरुद्ध खडा किया !
ऐसी प्रतिज्ञाओं का पालन करते रहने को कृष्ण धर्म नहीं मानत हैं। उनकी दृष्टी में यह प्रतिज्ञाबद्ध होने का अहंकार मात्र हैं !
और वह धर्म कैसा जो आपको बद्ध करता हो ?
धर्म तो मुक्त करता हैं , स्वतंत्रता देता हैं। धर्म मनुष्य को सत्पक्ष का साथ देने की बुद्धी और अधिकार देता हैं।
यदि भीष्म को इसका विस्मरण हुआ था तो पाण्डव भी गुरुजन और सगेसंबधियों को अधर्मपालन के लिए दण्ड ना देकर पथभ्रष्ट ही हो रहे थे ।
इसिलिए अंततः श्रीकृष्ण ने कहा की वह अपनी प्रतिज्ञा तोडकर भीष्म की मृत्यु के लिए सुदर्शन चक्र चलाएंगे।
श्रीकृष्ण के लिए प्रतिज्ञा यह बंधन नहीं हैं। प्रतिज्ञा यदि धर्म रक्षा के मार्ग में आएं तो उसे तोडा भी जा सकता हैं। अधर्म की रक्षा करनेवाली प्रतिज्ञा का रक्षण श्रीकृष्ण की दृष्टी में धर्म नहीं हैं !
इस बात को अनदेखा कर भीष्म अपनी प्रतिज्ञा के पालन को ही धर्म मानते रहे। उनकी प्रतिज्ञाओं के छत्र में अधर्म पलता - बढता रहा और वह प्रतिज्ञा को बंधन मानकर स्वयं को विवश - असहाय्य मानते रहे।
श्रीकृष्ण द्वारा कदाचित उन्हे यह बताया भी गया हो, परंतु वह प्रतिज्ञापालन के दंभ से स्वयं को विलग नहीं कर पाए जबकी कृष्ण अधर्म के विनाश के लिए स्वयं की प्रतिज्ञा भी भंग करने के लिए तैयार थे।
एक ऐसाही उदाहरण हम और भी देखेंगे।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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