#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १३१ - दि. ०२.१०.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १३१: दि. ०२.१०.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
सुसंगति का प्रभाव सब जानते हैं। सज्जन, सद्विचारी, मृदुभाषी व्यक्तियों की संगत मात्र आनंददायी नहीं, अपितु प्रेरणादायी और शिक्षाप्रद भी होती हैं।
संस्कार ना तो भाषण से होते हैं ना ही उपदेश से, संस्कार होते हैं परिवेश से !
हम जिनकी संगत में रहते हैं उनके आचरण का प्रभाव यह भी संस्कार हैं और वह धर्म के मार्ग पर चलने में हमारी सहायता करता हैं।
श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों ने सदैव धर्माचरण किया। इसी कारण उनकी संगत में, उनके प्रभाव में रहनेवाले व्यक्ति भी धर्म मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित हुए।
हम उदाहरणों सें देखेंगे और आज के युग में उसकी प्रासंगिकता पर विचार करेंगे।
श्रीराम ने माता की इच्छा व पिता की आज्ञा के अनुसार वनवास स्वीकार किया और युवराज होनेपर भी राज्य का त्याग किया।
ऐसे ज्येष्ठ भ्राता की भक्ती करनेवाले भरत के मन में भी अनायास मिले राज्य का मोह नहीं उपजा। उन्होने श्रीराम के नाम से चौदह वर्षों तक राज्य चलाया। लक्ष्मण तो पहले ही श्रीरामसेवा के लिए चल पडे थे। उन्हे ना तो राजमहल का सुख लुभा पाया ना वनवास के कष्ट डरा पाएं। सुग्रीव और हनुमानजी के लिए हम मान लेते हैं कि वह मूलतः सत्प्रवृत्त ही थे। परंतु लंका में रावण के साथ कुंभकर्ण भी था और बिभिषण भी थे। एक को रामनाम ने लुभाया तो उनका कल्याण हुआ। दूसरे ने रावण का साथ नहीं छोडा तो मृत्युमुख में समा गया।
मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य अवश्य है किंतु इस प्रकार दण्ड के रुप में मृत्यु वांछित नहीं होनी चाहिए !
महाभारत में भी हाथ में आया हुए राजसिंहासन त्यागने के अनेक उदाहरण हैं।
कंस के वध के पश्चात श्रीकृष्ण के पास इतना अधिकार था की वह अपने पिता वसुदेव को राज्य देने की माँग कर सकते थे जिससे आगे चलकर वह उन्हीं के वंश में आता। राजा उग्रसेन तक इसका विरोध नहीं करते। परंतु धर्मतः राज्य उनका नहीं था इसलिए बालक कृष्ण ने भी उसका मोह नहीं रखा।
आगे चलकर जरासंध वध के पश्चात उसका राज्य उसके पुत्र सहदेव को सौंपना, शिशुपाल वध के बाद चेदीदेश का राज्य उसके पुत्र धृष्टकेतु को देना, नरकासुर वध के उपरांत प्रागज्योतिषपुर (आधुनिक गुवाहाटी) का राज्य उसके पुत्र भगदत्त के स्वाधीन करना यह तो श्रीकृष्ण के जीवन के उदाहरण हैं।
पाण्डवों ने तो जो धर्मतः उनका था उस हस्तिनापुर राज्य के लिए भी आक्रमक वृत्ती नहीं रखी थी। अर्जुन का विवाह मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा से विवाह किया तब वह मणिपुर के राजा बन सकते थे। अर्जुन पाण्डव बनकर कहीं भी रहते तो राजा धर्मराज युधिष्ठिर ही बनते, अर्जुन को तो उनके अधीन ही रहना था। फिर भी अर्जुन ने ऐसा कोई मोह नहीं रखा, वचन के अनुसार पुत्र बभ्रुवाहन को उसके मातामह (नानाजी) के राज्य के उत्तराधिकारी के रुप में सौंपकर स्वयं अपने भ्राताओं के पास लौट गए।
यह उनकी अपनी सत्प्रवृति थी, माता कुंती के संस्कार भी थे और श्रीकृष्ण की संगत और मार्गदर्शन का प्रभाव तो था ही था।
सारांश, अच्छी संगत में रहकर अपनी आत्मा का कल्याण कर परलोक सुधारा जा सकता है अथवा भौतिक सुख के लिए धर्म / अधर्म के विचार का त्याग भी किया सकता हैं।
निर्णय हमें करना हैं कि हम क्या चाहते हैं।
उपर उल्लिखित सब उदाहरण तो हमारे इतिहास के हैं। आज के युग में उनकी प्रासंगिकता पर भी हम विचार करेंगे क्योंकि युग बदलते हैं किंतु धर्म तत्व सभी युग में अक्षय होते हैं !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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