#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १११ - दि. १२.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ११२: दि. १३.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
ईश्वर पर श्रद्धा मनुष्य के गुणों का संवर्धन करती हैं। साथ ही तुलनात्मक स्थितप्रज्ञता से मनुष्यजीवन के उतार चढावों को पार कर अंतत: ईश्वर के निकट ले जाती हैं इसका उदाहरण पाण्डवों में देखा जा सकता है।
पूर्वार्ध :
पाँचो भाई पंडुपुत्र होने के कारण पाण्डव कहलाते थे।
वैसे यह बुद्धीभेद ही हैं क्योंकि कुरुवंश से होने के कारण दुर्योधन और उसके भाई यदि 'कौरव' कहलाते थे तो पाण्डवों को भी यह अधिकार था !
वे भी तो कुरुवंश से ही थे !
परंतु उन्हे उनके पिता पण्डु के नाम से पाण्डव कहा गया जबकी धृतराष्ट्र पुत्रों को पिता के नाम पर धार्तराष्ट्र अथवा ऐसा कोई अन्य नाम नहीं दिया गया।
इससे लोगों के मन में यह भ्रम निर्माण होता हैं कि कौरव कुरुवंश से थे परंतु पाण्डव कुरुवंश के नहीं थे।
क्योंकि पाण्डवों की जन्मकथा सर्वज्ञात हैं। ऋषि दुर्वास द्वारा दिए गए वर के कारण विविध देवताओं की कृपा कुंती व माद्री पर हुई जिससे पाण्डवों का जन्म हुआ ऐसा हम सुनते - पढते आएं हैं।
परंतु संभवतः पाँचो पाण्डवों के जन्म नियोग पद्धति से हुए हैं। पाण्डु स्वयं सन्तानोत्पत्ति में असमर्थ थे इसलिए कदाचित प्रजा की प्रश्चचिन्हांकित दृष्टी से बचने के लिए उन्होने वन में जाने का निर्णय लिया। पत्नीधर्म की बात कहकर कुंती और माद्री ने उन्हे साथ ले जाने के लिए मनाया।
संतान ना होने के कारण वन में भी पाण्डु दुखी और निराश ही रहते थे। तब कुंती ने उन्हे ऋषि दुर्वास द्वारा दिए गए वर के संबध में बताया।
इन वरों के कारण कुंती किसी भी दिव्य पुरुष से नियोग विधि द्वारा संतान प्राप्त कर सकती थी।
आज के युग में जैसे surrogacy अथवा Sperm Donor को मान्यता हैं, उस युग में वैसी ही मान्यता नियोग विधि के लिए थी।
नियोग विधि केवल संतानउत्पत्ति के लिए ही मान्य था। उसमें सम्मिलित व्यक्तियों की इच्छापूर्ति / कामपूर्ति का भाव उसमें नहीं हो सकता था।
पति के जीवनकाल में भी यह मान्य था, यद्यपि इसमें पति की अनुमति आवश्यक होती थी।
पति की मृत्यु के पश्चात भी वंश आगे चलाने के लिए स्त्री को नियोग विधि द्वारा संतानोत्पत्ति की अनुमति थी।
कुंती को प्राप्त वर की जानकारी से पाण्डु अत्यंत प्रसन्न हुए।
उनकी अनुमति से कुंती ने यमराज से युधिष्ठिर, पवनदेव से भीम और इन्द्र से अर्जुन को जन्म दिया।
पाण्डु और पुत्र चाहते थे।
परंतु नियोग का अर्थ वासनापूर्ति नहीं होना चाहिए इसलिए कोई भी स्त्री केवल तीन बार ही नियोग विधि की सहायता ले सकती हैं ऐसा बन्धन था।
कुंती धर्मशील थी। उन्होने पुनः नियोग विधि के लिए असमर्थता व्यक्त की, परंतु अपने उर्वरित (remaining) वरों का वान माद्री को किया।
माद्री ने देवों के वैद्य अश्विनीकुमार का आवाहन कर नकुल और सहदेव यह जुडवा पुत्र प्राप्त किए।
पाण्डु की मृत्यु और माद्री द्वारा चितारोहण के पश्चात कुंती अपने अल्पवयीन पुत्रों के साथ हस्तिनापुर लौट आई।
अब तक धृतराष्ट्र ने अधिकार ना होते हुए भी सिंहासन हडप लिया था और वह अपने पुत्रों के राज्याभिषेक को निश्चित मान रहा था।
अब पाण्डवों के लौटने से धृतराष्ट्र को अपनी योजना में बाधा दिखाई दी और उसने विविध षड्यंत्र आरंभ किए।
पाण्डु के पुत्रों को पाण्डव कहना कदाचित इसी का भाग हो सकता हैं ।
वास्तविकता यह है की उस दृष्टी से अंतिम कुरु तो भीष्म ही थे, हस्तिनापुर के राजा शान्तनु के पुत्र !
धृतराष्ट्र और पाण्डु का जन्म तो पिता विचित्रवीर्य की मृत्यु के पश्चात महर्षि वेदव्यास द्वारा नियोग पद्धति से हुआ था। शान्तनु की रानी सत्यवती ने अपनी पुत्रवधुओं को, अर्थात अंबिका व अंबालिका को, नियोग द्वारा संतानोत्पत्ति के लिए बाध्य किया था। इसलिए कुरुवंश के अंतिम कुरु थे भीष्म ! उनके पश्चात तो केवल वंशसातत्य के लिए धर्मपालन ही हुआ हैं।
ऐसे में केवल धार्तराष्ट्रों को कौरव कहना बुद्धीभेद करने का मार्ग हैं !
इस प्रकार छोटी छोटी बातों में मनुष्य के मन में भ्रम निर्माण करने करने के कारण वह आत्मविश्वास गँवा देता हैं।
👆🏼 यह आजकल के युग में भी लागू हैं।
जैसे, यह प्रचार किया जाता हैं कि 'आर्य' भारत के मूलनिवासी नहीं हैं, वह तो बाहर से अर्थात शीतप्रदेश से (आर्टिक सर्कल से निकलकर युरोप के मार्ग से) आए हैं।
यदि किसी को 'बाहरवाले / विदेशी' बना दिया जाए तो फिर उसके अधिकार छीनने के भी मार्ग खुल जाते हैं !
देखा जाए तो विश्व में सभी जगहों पर ऐसा आवागमन चलता रहता हैं। अमरिका को Melting Pot कहते हैं क्योंकि वहाँ के मूल Indians को अपने ही देश में विस्थापित कर अन्य देशों से आए हुए लोगों ने उसे अपना देश बनाया हैं। लगभग यही स्थिति न्यूझीलंड और ऑस्ट्रेलिया की है। दक्षिण अफ्रिका और अफ्रिका खण्ड के अनेक देशों में युरोपियन्स ने कैसा कब्जा कर लिया था यह इतिहास भी अभी नया ही है। यही स्थिति दक्षिण अमरीका के अनेक देशों की है, Grrenland की भी है। मध्यपूर्व से निकलकर अरब और मुस्लिम भी विश्वभर में फैल गए है।
तात्पर्य यह है कि आर्यों के बाहर से आने के झूठे प्रचार पर विश्वास नहीं करना चाहिए !
हम सनातनी हिंदु इसी राष्ट्र के नागरिक है और रहेंगे !
उत्तरार्ध : कल दि १४.०९. २०२३ को
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें