#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १६१- दि . ०१.११.२०२३
हिंदु-धर्मसंस्कार
भाग १६१: दि. ०१.११.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
एक ओर देश के अनेक भागों में स्वधर्म के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान देने के उदाहरण सामान्य जन के मन में धर्मनिष्ठा की ज्योत जलाएं रख रहे थे।
दूसरी ओर स्वार्थवश परकी आक्रमकों के सामने घुटने टेककर उनका बल बढाने के उदाहरण भी कम नहीं थे।
ऐसे देशद्रोहियों और धर्मद्रोहियों के लिए मोह अनेक प्रकार के थे, पद के, वतन के, धन के, सत्ता के..
देशद्रोह, राजद्रोह, मित्रद्रोह, धर्मद्रोह इनमें से हर एक मार्ग स्वार्थ के लिए उन्हे स्वीकार्य था।
लाचारी की सीमा लांघकर अपनी बहन - बेटियों को आक्रमकों के जनानखाने में भेजा जा रहा था। यद्यपि यह विवाह ही थे, किंतु धर्म के बाहर ऐसे विवाह कराने का कारण मात्र सत्ताधारीयों की कृपा प्राप्त करना ही था, अपने धर्म में सुयोग्य वरों का अभाव नहीं !
आमेर (जयपूर) के राजघराने से प्रारंभ हुई इस पहल का अनुकरण कर बिकानेर, जैसलमेर, मारवाड, डुंगरपूर, नागरकोट, मनोहरपुर, किशनगढ़ आदि अनेक राजघरानों की राजकुमारियाँ मुघल बादशाहों से ब्याही गई।
राज्यकर्ता जब ऐसी सत्वहीन कृति करते हैं तो सामान्य जनता भी उनका अनुकरण अनेक प्रकार से करती है। परधर्म के लिए सम्मान और सहिष्णुता होना और बात है किंतु अपने धर्म के आगे परधर्म को रखना सामान्य जन के लिए धर्मद्रोह नहीं रह जाता जब राज्यकर्ता ही इस प्रकार घुटने टेक देते हैं।
राजस्थान पर्यटकों के लिए लोकप्रिय स्थान हैं। वहाँ अनेक सुंदर रजवाडे हैं जिनकी कारागिरी देखते ही बनती है। रजवाडों की दिवारों पर, बरामदों में, गवाक्षों में अप्रतिम कारगिरी है जिसका वर्णन गाइड अत्यंत उत्साह से करते हैं। इनको बनाने वाले कारीगरों का कौशल मंत्रमुग्ध करनेवाला है इसमें कोई संशय नहीं है।
आधुनिक युग में पुराने रजवाडों को अलिशान होटलों में बदल दिया गया है और इनमें निवास के समय इन रजवाडों की उत्तम रखरखाव पर पर्यटक मुग्ध होते हैं।
दूसरी ओर महाराष्ट्र के किले भग्न अवस्था में है। ढह गई दिवारे और टूटे निवासस्थान .. इसका उपहास भी किया जाता हैं कि महाराष्ट्र के किलों में सारी इमारते खंडहरों जैसी हैं।
किंतु वास्तव में यह हमारे अभिमानास्पद इतिहास की साक्ष देनेवाले प्रेरणादायी स्मारक हैं! इन्होने परकी, क्रूर आक्रमकों के तोपों के गोले अपनी छाती पर झेले थ, शत्रु ने इनकी रक्षक दिवारों पर, तटों पर जो बारुद बरसाई थी उस आग से खेलकर इन किलों ने स्वराज और सुराज खडा करनेवाले वीर संतानों की रक्षा की थी, शत्रु ने इन किलों में घुसकर जब तोडफोड की थी तो इमारतों की पक्की दिवारों ने स्वयं घाव झेलकर अपने सुपुत्रों को रक्षा का आवरण दिया था..
रायगड, राजगड, प्रतापगड, पुरंदरगड, विशालगड, पन्हालगड, सिंहगड, भूपालगड.. हरएक किले पर मराठों की शौर्यगाथा लिखी हुई है..
इन किलों को खंडहर नहीं, हुतात्मा कहना चाहिए क्योंकि उन्होने स्वधर्म और राष्ट्रधर्म निभाने के लिए अगणित वार झेले थे, परकी आक्रमकों के समक्ष शीश झुकाकर लाचारी से अपने रजवाडे बचाए नहीं थे !
बलिदान क्या केवल जिवित प्राणी करते हैं ?
इन किलों ने भी तो 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावह' इस उपदेश का ही निर्वाह किया हैं ❗
उत्तम कारीगरी के उतने ही उत्तम रखरखाव के नीचे दबी लाचारी की परत का विद्रुप दर्शन करनेपर तो हमारे टूटे फूटे किले ही गर्व से मस्तक उँचा रखने का सौभाग्य देते हैं !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें