#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १३८- दि. ०९.१०.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १३८: दि. ०९.१०.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
हम दैनंदिन जीवन में विविध उपकरणों का उपयोग करते हैं जैसे पंखा, ए.सी., वाहन आदि। यह सभी धातू / प्लास्टिक अथवा अन्य पदार्थ से बने होते हैं अर्थात निर्जीव वस्तू। इनका अस्तित्व तो हैं किंतु यह अपनेआप कार्यशील या गतिशील नहीं हो सकते। इनके लिए उर्जा की आवश्यकता होती है। जैसे विद्युत उर्जा अथवा इंधन से निर्मित उर्जा।
ठीक इसी प्रकार मनुष्य का शरीर भी स्वचालित नहीं है। उसे भी उर्जा की आवश्यकता होती हैं। और इस उर्जा का स्त्रोत हैं प्राणमय कोश। यह कोश मनुष्य देह के लिए प्राण नामक उर्जा प्रदान करता है। देह की प्रत्येक पेशी तक प्राण की पहुँच हैं और जो गतिविधि हम करते हैं जैसे चलना, पढना - पढाना इत्यादी के अनुसार उर्जा का प्रवाह शरीर के उस भाग की ओर अधिकता से भेजा जाता हैं।
मनुष्य शरीर से प्राण निकल जाने की स्थिति अर्थात मृत्यु। किंतु प्राण केवल शरीर छोड़कर जाते हैं, वह नष्ट नहीं होते। भौतिकशास्त्र के नियम के अनुसार भी उर्जा नष्ट नहीं होती हैं, उसका केवल रुप बदलता है।
प्राणमय कोश आत्मा का आवरण हैं और आत्मा का सबसे बाहरी आवरण अर्थात अन्नमय कोश दृश्य भी हैं और नष्ट भी होता हैं। इसका भौतिक अस्तित्व हैं। यह मनुष्य द्वारा सेवन किए गए अन्न से विकसित होता हैं।
परंतु अन्य कोश ना तो दृश्य हैं ना इनका विकास, संतुलन व प्रगति किसी भौतिक पदार्थ से होती है।
यद्यपि यह दृश्य नहीं हैं किंतु जिस प्रकार हम शरीर को स्वस्थ रखने और बलिष्ठ बनाने के लिए प्रयत्न करते हैं उसी प्रकार अन्य कोशों की स्वस्थता और विकास के लिए भी प्रयत्न आवश्यक होते है।
प्राणमय कोश के लिए प्राणायाम आवश्यक है। प्राणायाम में हम अपने श्वास पर ध्यान केंद्रित करते हैं। श्वास और उच्छ्वास पर ध्यान केंद्रित करनेपर थोडे समय के पश्चात मन विचाररहित होने लगता हैं और शांति का अनुभव होता हैं।
यह तनावरहित, शांति की अवस्था ही प्राणमय कोश को सुदृढ बनाती हैं।
शरीर चलाने के लिए जो उर्जा का स्त्रोत है उसे पुष्ट करने से हम शरीर को भी स्वस्थ रख सकते हैं।
इस संबध में चर्चा हम मनोमय कोश के संदर्भ में आगे बढाएंगे।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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