#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १२७ - दि. २८.०९.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १२७: दि. २८.०९.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

श्रीमद्भगवद्गीता प्रत्येक समय में मार्गदर्शक होती हैं। परंतु उसके उद्गाता का जीवन मार्गदर्शक कैसे है ?

हम श्रीकृष्ण नहीं है। हम सामान्य - साधारण मनुष्य है। ऐसे में श्रीकृष्ण के जीवन में जो घटनाएँ घटी थी उससे हमारा संबंध कैसे हो सकता हैं ?
ठीक हैं, वह ईश्वर हैं , मार्गदर्शक है, किंतु हमारे जीवन में उनके जीवन की घटनाएँ उपयुक्त कैसे होंगी ?
और क्या आजके युग में वह प्रासंगिक हैं ?
क्या हम उनका अनुकरण कर सकते है या यह केवल कहानियाँ हैं ?

यह केवल कहानियाँ नहीं है !
इनके अनुसार आचरण आज भी किया जा सकता है, किया जाना चाहिए। तभी हिंदु धर्म की महत्ता को कायम रखा जा सकता है।
कैसे ?
हम उदाहरणों से देखेंगे।

अनेकों बार हमें लगता हैं कि हमारा जीवन अत्यंत कष्टपूर्ण हैं, बाधाएँ बहुत अधिक हैं और हमारी तुलना में औरों का जीवन सरल है। तब हम निराश होते हैं, अनेकों बार उन लोगों से ईर्ष्या करते हैं जो हमें लगता हैं की सुखी हैं। 
इससे मन अस्वस्थ हो जाता है , जिसका परिणाम ना केवल हमारे स्वभाव पर बल्कि शरीरपर भी होता है। सब जानते हैं कि मानसिक तनाव रक्तचाप व मधुमेह (BP & Diabetes) के प्रमुख कारणों में से हैं।

अब इसका श्रीकृष्ण से क्या संबध हैं ? 

यद्यपि श्री विष्णु स्वयं मानवरूप में अवतरित हुए थे परंतु उन्होने श्रीकृष्ण अवतार में मनुष्य जीवन की मर्यादाओं का पालन किया है।

उनका जीवन भी तो सर्वसाधारण व्याख्या के अनुसार शांत, सुखी नहीं था।
जन्म होते ही वह माता - पिता से बिछुड गए..
उन्हे मारने के लिए कंस एक के बाद एक हत्यारों को भेजता रहा..
दस वर्ष की आयु में जब उन्हे अपना जन्मरहस्य ज्ञात हुआ तब जनक माता - पिता तो मिल गए परंतु नंद - यशोदा और उनके प्रिय गोपालों से वह सदा के लिए बिछुड गए..
उनके भाग्य में अपने मातुल (मामा) का वध करना लिखा था। यद्यपि वह आवश्यक था परंतु इतने निकट के संबधी की मृत्यु का कारण बनना भी सामान्य बात नहीं है..
उनके पुत्र ने भी उन्हे अप्रसन्न करने जैसा कृत्य किया। जांबवती के पुत्र सांब ने दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा का हरण कर उससे विवाह किया। सोचिए, दुर्योधन की पुत्री को कुलवधू के रुप में उन्हे स्वीकार करना पडा..
उनके ज्येष्ठ भ्राता बलराम दुर्योधन के पक्षपाती थे और कृष्ण को अनेको बार चतुराई से योग्य निर्णय लेने की कसरत करनी पडती थी..

अर्थात हमारे जीवन के समान श्रीकृष्ण के जीवन में भी समस्याएँ थी, माना जाए तो दुख ही था। 
किंतु वह विचलित नहीं हुए। ना तो सुख से मद चढा ना दुख से निराश हुए।
वह प्रत्येक स्थिति में संतुलित ही रहे और उन्होने अपना सहज माधुर्य कायम रखा।

श्रीकृष्ण से हमें यहीं तो लेना हैं !

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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