#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १५१ - दि. २२.१०.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १५१: दि. २२.१०.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
जिस प्रकार कुरुक्षेत्र में अर्जुन के मन का अवसाद दूर कर प्रभु ने उन्हे कर्तव्योन्मुख किया व असमय - अनावश्यक विरक्ती से दूर किया उसी प्रकार आधुनिक युग में छत्रपती शिवाजी महाराज व समर्थ रामदासस्वामी इनका भी एक प्रसंग हैं।
राजनिति की धकाधक और दांवपेचों से महाराज का मूलतः पवित्र मन उदास हो गया था। उन्हे संन्यास लेने की इच्छा हुई। परंतु स्वामीजी ने उन्हें यह कहकर परावृत्त किया की यह राजा का धर्म नहीं है । प्रजारक्षण व प्रजापालन, स्वराज्य स्थापन व स्वधर्म का उन्नयन यहीं उनका धर्म है ❗
यदि वे संन्यास लेंगे तो वह कर्तव्य से मुँह मोडने का पातक होगा क्योंकि भौतिक जीवन को तुच्छ माननेपर समाज की हानि होती हैं।
हमारे देश में बौद्ध धर्म की लोकप्रियता बढने पर शांति और अहिंसा के प्रति आस्था भी बढने लगी थी।
शांति व अहिंसा के तत्व व्यक्तिगत जीवन के लिए उपयुक्त और आदर्श हैं किंतु समाजजीवन के लिए नहीं क्योंकि शांति और अहिंसा एकतर्फा होने से समाज का संतुलन बिगड़ता है। इसलिए जब देश के राजाओं में भी इनके प्रति आकर्षण बढने लगा तब समाज से क्षात्रतेज ही लुप्त होने लगा। क्षत्रिय का धर्म प्रजा का, राज्य का रक्षण करना है और उसके लिए क्षत्रियों को रजोगुण आवश्यक है। अन्यथा बाहरी आक्रमण होनेपर पराजय व पराधीनता निश्चित है।
जहाँ राज्यकर्ता इन तथ्यों को अनदेखा कर अपना तेज खो रहे थे वहीं सामान्य जनता में श्रमणवृत्ति का आकर्षण बढ रहा था, दीक्षा लेकर साधु बनने को अत्यंत सम्मान दिया जाता था और कुटुंब, समाज, राष्ट्र के प्रति व्यक्ती के कर्तव्य को गौण माना जाने लगा था।
यहीं वह काल हैं जब भारत देश पर बाहरी, परकीय राज्यकर्ताओं के आक्रमण का प्रारंभ हुआ और अहिंसा के अतिरेकी जयजयकार के कारण तेजरहित राज्यकर्ताओं ने हमारे देश को १००० वर्षों तक गुलामी का दुर्भाग्यशाली कालखंड में झोंक दिया !
सारांश, संन्यास लेना तभी उपयुक्त हैं जब व्यक्ती ने समाज के प्रति अपने दायित्वों को पूरा किया हैं। अपवादों को छोड़कर, अल्प आयु में अथवा अपरिपक्व वय में संन्यास ग्रहण करना अथवा ऐसी परंपराओं का जयजयकार करने के लिए अहिंसा का बढचढकर उद्घोष करना, उसे ही समाज के लिए आदर्श मानना अंतिमतः समाज के लिए हानिकारक होता हैं ।
इसिलिए सनातन हिंदु धर्म में क्रमश: एक आश्रम से दूसरे आश्रम में प्रवेश करने का विधान हैं जो सर्वसाधारण व्यक्ति, समाज व देश के लिए भी आवश्यक व उपयुक्त है!
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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