#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १२५ - दि. २६.०९.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १२५: दि. २६.०९.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए क्या आवश्यक हैं इसका विचार हम पाण्डवों के समक्ष पितामह भीष्म और कृपाचार्य को रखकर कर रहें थे।

पाण्डवों को कृष्ण के कृपाछत्र का लाभ हुआ और उनके मार्गदर्शन में वह धर्माचरण के उच्चतम मानदंड प्रस्थापित करते गए।

परंतु यह सौभाग्य ना तो भीष्म को प्राप्त हुआ ना कृपाचार्य को, यद्यपि वह दोनो भी स्वयं सद्वर्तनी, निर्लोभी और विरागी स्वभाव के थे।

परंतु केवल स्वतः सदाचारी होना ईश्वर की कृपा के लिए पर्याप्त नहीं होता है। वह तो ईश्वरप्राप्ती के लिए अत्यावश्यक गुणों में से एक है।

भीष्म और कृपाचार्य के साथ समस्या यह थी की स्वयं के मोह के चलते वह सदैव दुराचारियों का साथ देते रहे !
उन्होने स्वयं अन्याय नहीं किया, परंतु जिनके पक्ष में वह थे उनके अन्याय को वह देखते रहे, उस अन्याय को ना रोक पाने को अपनी विवशता मानकर उन्होने अत्याचार को बढने दिया..

भीष्म ने समग्र समाज के कल्याण के लिए धर्मरक्षण को महत्वपूर्ण नहीं माना था। उन्होने अपनी प्रतिज्ञा को अपनी श्रृंखला माना और अन्याय को रोकने को प्रतिज्ञाभंग का पाप समझा..
पाण्डवों को हस्तिनापुर का राज्य देने से नकारना हो, द्यूत में हराकर कपट से उनका इंद्रप्रस्थ राज्य हरण करना हो अथवा कुरुकुल की वधू द्रौपदी का कुरुओं की राजसभा में भयंकर पीडादायी अपमान हो, भीष्म ने ना अपना खड्ग उठाया ना धृतराष्ट्र या दुर्योधन को रोका। 

समर्थ थे भीष्म !
गुरु परशुराम के प्रिय शिष्य कुरुकुलगौरव महाप्रतापी गांगेय भीष्म ! 
उनकी प्रत्यंचा पर यदि बाण चढते तो अर्जुन को छोड़कर कुरुओं की राजसभा में ऐसा कौन महावीर था जो उनके बाणों से बच निकलकर भी अपना अधर्मी उत्पात कायम रखता ?

परंतु भीष्म ने ऐसा इसलिए नहीं किया की उन्होने 'कुरु सिंहासन की रक्षा' को अपना धर्म माना था। परंतु कुरुओं के सिंहासन पर धृतराष्ट्र व दुर्योधन का अधिकार ना होते हुए भी वह हथियाएं बैठे है और पाण्डवों को वह सिंहासन दिलाना यही कुरु सिंहासन की रक्षा के मायने हैं यह भीष्म समझ नहीं पाए।
कुरुक्षेत्र पर युद्ध निश्चित होनेपर भी उन्होने अपने धर्म का सत्य स्वरूप नहीं पहचाना और मन से पाण्डवों के साथ और तन से दुर्योधन के साथ रहे, कौरवों के सेनापति बनाए गए और इस स्थिति को स्वयं की विवशता मानकर छटपटाते रहे !

धर्म के प्रति केवल आस्था पर्याप्त नहीं होती, धर्म को समझने की दृष्टी होनी चाहिए और धर्मरक्षण के लिए सर्वस्व का - स्वयं की प्रतिज्ञाओं का भी - त्याग करने का धैर्य होना चाहिए !

स्वयं की किर्ती धूमिल ना हो इसलिए प्रतिज्ञा के चीथडों से धर्मरक्षा के अनमोल अवसरों को पोछ देना यह ईशप्राप्ती के मार्ग में बाधा हैं ।

और धर्म के सूक्ष्म रुप को समझकर उसके लिए सर्वस्व को तिलांजली देना ईशप्राप्ती का निश्चित मार्ग हैं !

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २१३

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २४८

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २०२