#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ११९- दि. २०.०९.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ११९: दि. २०.०९.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

प्रतिज्ञाओं में बद्ध होकर अत्याचारी - अधर्मीयों का साथ देने का दूसरा उदाहरण कर्ण का हैं।
यह ऐसी व्यक्तिरेखा हैं जो स्वयं के वास्तव से असंतुष्ट हैं। सारथि परिवार से होने के कारण वह हीनभावना से ग्रस्त है। उसे तथाकथित उच्च कुलों से होने की अभिलाषा हैं और राजकुल में सम्मानित स्थान ना होने का अत्यंत दुख हैं।

जो व्यक्ती स्वयं के जीवन से असंतुष्ट होता हैं वह खोखले प्रलोभनों की बलि कैसे चढता है इसका उदाहरण है कर्ण !

दुर्योधन ने कर्ण के शस्त्रकौशल को जब देखा तब उसे लगा की यह धनुर्धर अर्जुन को मात दे सकता हैं। 
धूर्त तो वह था ही, इसलिए मैत्री का नाटक कर उसने कर्ण का मन जीत लिया। दुर्योधन की स्वार्थलिप्त कृति को सम्मान और प्रेम मानने की भूल कर्ण ने की और उसके पतन का आरंभ हुआ !

अच्छी संगत का परिणाम अच्छा होता हैं और दुष्ट दुर्जनों की संगत का परिणाम हानीकारक होता हैं। 
इसी कारण दुर्योधन की संगत में रहकर कर्ण की वृत्ति और अधिक कडवाहट से भरती रहीं। दुर्योधन तो फिर भी राज्य पाने के लिए पाण्डवों का प्रतिस्पर्धी बन बैठा था।
किंतु कर्ण के लिए ऐसा कौनसा कारण था ?
हाँ, वह विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनना अवश्य चाहता था और इसमें अर्जुन की बाधा देखकर उससे ईर्ष्या करने लगा था।
वस्तुत: कर्ण एक अच्छा धनुर्धर अवश्य रहा होगा किंतु अर्जुन की तुलना में वह उन्नीस ही था यह अनेक प्रसंगो में सिद्ध हुआ हैं।

जैसे, पाण्डवों के वनवास काल में द्वैतवन में गंधर्व चित्रसेन की सेना ने दुर्योधन और उसकी सेना को बंदी बनाया तब कर्ण भी तो साथ में था। परंतु वह चित्रसेन को पराजित नहीं कर पाया ! पाण्डवों को जब इसकी सूचना मिली तब उन्होने दुर्योधन व अन्य सबको मुक्त किया और कहना ना होगा की इस मुक्ति अभियान के नायक अर्जुन थे।

इसके पश्चात भी कर्ण अर्जुन से पुनः पराजित हुआ। 

पाण्डव अपने अज्ञातवास काल में मत्स्य देश में राजा विराट के आश्रय में थे। तब दुर्योधन ने सेनासहित मत्स्य देश पर आक्रमण किया क्योंकि उसे संदेह हुआ था की पाण्डव उसी देश में होंगे। 

मत्स्यराज की सेना हस्तिनापुर के सैन्य से युद्ध के लिए सक्षम नहीं थी। परंतु अज्ञातवास का काल समाप्त हो गया था इसलिए पाण्डव अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए। 
इस अभियान में दुर्योधन की सेना में ना केवल कर्ण, बल्कि भीष्म, द्रोण, अश्वत्थामा जैसे महारथी भी थे। परंतु यहाँ भी कर्ण के साथ इस संपूर्ण सेना का पराजय हुआ ।

इन घटनाओं से स्पष्ट हैं कि अर्जुन और कर्ण समतुल्य तो नहीं ही थे। फिर भी यदि कर्ण मन में बैर लिए शत्रुता करता रहे तो यह उसकी ओछी सोच का निदर्शक हैं ।

अपनी ऐसी ही आधारहीन शत्रुता के कारण कर्ण पाण्डवों से ईर्ष्या करता रहा, दुर्योधन के समान उन्हे अपमानित करने के लिए लालायित रहा, द्रौपदी को तो उसने वारांगना कहकर उसका घोर अपमान किया, अर्जुन से स्पर्धा करने की विकट इच्छा के कारण कर्ण ने गुरु परशुराम से असत्य भाषण किया (उसने स्वयं को ब्राह्मण बताकर शस्त्रविद्या ग्रहण की थी)।

इन सब के लिए क्षमा कर माता कुंती ने कर्ण को उसका जन्मरहस्य बताया और सबसे ज्येष्ठ पाण्डव होने का धर्म निभाने का निमंत्रण दिया।

परंतु कर्ण तो अपने धर्मपालन के भ्रामक व्यूह में फंसा रहा। उसे लगा की दुर्योधन ने उसका पूर्ण साथ दिया हैं तो अब अंत तक उसे भी दुर्योधन का ही साथ देना होगा। यही उसका धर्म हैं ऐसी कर्ण की धारणा थी। 

अर्थात अन्याय के पक्ष से बंधे रहने को ही उसने अपना धर्म मान लिया था जबकी उसकी जन्मदात्री व स्वयं श्रीकृष्ण बाँह पसारकर उसे अपनाने को सिद्ध थे !

यह हैं धर्मपालन संबंधी भ्रांति !
कृष्ण धर्म का मर्म समझते हैं इसलिए अपनी प्रतिज्ञा तोडकर सुदर्शन चक्र उठा सकते हैं ।
और कर्ण जैसा लघुदृष्टी मनुष्य धर्म को श्रृंखला मानकर उसमें स्वयं को बांधता हैं और विनाश को आमंत्रित करता हैं !

इसिलिए हमे गीता पढनी - समझनी चाहिए जो धर्म का अर्थ समझाकर हमारा कल्याण करेगी 🙏🏼

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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