#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १२९ - दि. ३०.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १२९: दि. ३०.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
श्रीमद् भागवत, श्री देवीभागवत, श्री शिवपुराण, रामायण, महाभारत आदि हमारे धर्मग्रंथ है।
सभी में ईश्वर और ईश्वर के अवतारों का आख्यान हैं।
सभी में देवशक्तियों द्वारा दुर्जन व असुरो के विनाश का वर्णन हैं।
ध्यान देनेयोग्य बात यह हैं कि देवशक्तियाँ अत्यंत सामर्थ्यसंपन्न होते हुए भी उन्होने असुर संहार तभी किया जब असुरों ने अत्याचार - अनाचार किए थे। असुर भी तो शक्तिशाली थे। वह यदि अपनी शक्ति का अच्छा उपयोग कर संपत्ति बनाते, उसका उपभोग करते तो देवों को भी आपत्ति नहीं होती।
किंतु असुरों की पद्धति दूसरों का दमन करने की और उनकी संपत्ति का हरण करने की होती हैं।
मनुष्यों के लिए यह सतर्क होने का विषय इसलिए है क्योंकी कई बार असुर असुरों जैसे दिखते नहीं हैं, उनका रुप मनुष्यों जैसा ही होता हैं परंतु वृत्ति से वह असुर होते हैं। वह हमारी वृत्ति को भी प्रभावित कर सकते है और हमें पता ही नहीं चलता।
अनकों बार उन्हे 'असुर' जैसा कठोर विशेषण लगाना भी उचित नहीं होता, किंतु उनके जीवन से 'क्या नहीं करना चाहिए' इसकी सीख ली जाता सकती है।
महाभारत में इसका एक उत्तम उदाहरण हैं, आचार्य द्रोण का।
शिक्षा पूर्ण कर उन्होने जब गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया तब उनकी स्थिति अत्यंत साधारण, निर्धनता की थी। अपने नन्हे पुत्र को गाय का दूध देने तक की सुविधा नहीं थी। इस निर्धनता से दुखी होकर द्रोण पांचालराज द्रुपद की राजसभा में पहुँचे।
द्रुपद उनके गुरुबंधु थे। गुरुकुल में दोनों की प्रगाढ मित्रता थी। छोटी आयु में द्रुपद ने द्रोण को वचन दिया था कि जो कुछ उनका हैं वह सब द्रोण का भी हैं। किशोरावस्था के उसी भोले आश्वासन की उंगली पकड़कर द्रोण पांचाल राज्य में पहुँचे। उनकी अपेक्षा राजसी ठाठबाठ - मानसम्मान व आवभगत की थी। उन्हे लगा था की राजा द्रुपद उनसे गले मिलेंगे व अपने साथ बिठाकर बचपन का वचन निभाएंगे।
वास्तव में जब द्रोण राजसभा में पहुँचे तब राजा द्रुपद सिंहासन पर विराजमान थे। उन्होने द्रोण को आसन दिया और सत्कार किया। उनसे पूछा की वह क्या सेवा कर सकते है।
द्रोण को धक्का लगा।
कहाँ उनकी राजसी स्वागत की अपेक्षा और कहाँ द्रुपद द्वारा ब्राह्मण का नियमित रूप से किया जानेवाला सत्कार !
इसके पश्चात द्रोण ने द्रुपद से शत्रुता पाल ली। उन्होने निश्चय किया कि वह द्रुपद से बदला लेंगे।
उन्होने हस्तिनापुर में अपने लिए स्थान बनाया। कुरु राजकुमारों के आचार्य के रूप में राजसभा में भी उनका मान था।
किंतु हस्तिनापुर की राजसभा धृतराष्ट्र के वश में थी। वह तो स्वयं ही कुरु सिंहासन पर अनधिकार कब्जा कर बैठा था। पाण्डवों को उनका राज्य ना लौटाने का उसने प्रण ही कर लिया था। जो धर्मतः अपना नहीं हैं उसे अधर्म से हथियाकर उसका सुख भोगनेवाले धृतराष्ट्र की ही चाकरी कर रहे थे द्रोण। ऐसे में न्याय, नीती का विचार छोडकर द्रुपद का प्रतिशोध लेने की उनकी भावना ही प्रबल होती गई।
वैसे द्रुपद ने कौनसा अपराध किया था ?
किशोरवय में भोलेपन से मित्र को वचन दिया तो क्या द्रुपद का राज्य द्रोण का भी हो जाएगा ?
बचपन में ऐसे वचन जिनसे कहे जाते हैं उन्हे उसकी भावना का अनुभव कर आनंदित होते रहने तक ही रुक जाना चाहिए ना कि उसे शब्दशः सत्य मानकर द्रोण जैसी द्रुपद के राज्य की भागीदारी की अपेक्ष करना ..
कुसंगति के परिणामों पर चर्चा करने के लिए महाभारत में प्रचुर मात्रा में उदाहरण हैं। हम उन्हे देखेंगे और उसके पश्चात सुसंगति का प्रभाव भी देखेंगे।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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