#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १४८ - दि. १९.१०.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार 
भाग १४८: दि. १९.१०.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩 

भौतिक / दृश्य जीवन से आसक्ती दूर करना सनातन हिंदु धर्म में महत्वपूर्ण माना गया है।
इसका एक और उदाहरण है मनुष्य के लिए बताए गए चार आश्रम अर्थात ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रम।

पहले चरण में यानि ब्रह्मचर्याश्रम में विद्या अर्जित करना, उसके लिए जीवन संयमित रखना अपेक्षित हैं। इस चरण में अगले चरण के लिए पूर्वतयारी अर्थात धनार्जन करने योग्य कौशल प्राप्त करना भी निहित है।

दूसरा चरण गृहस्थाश्रम का है जिसमे मनुष्य को विवाह कर सांसारिक सुखोपभोग की अनुमति दी गई है और इस काल में अनेक प्रकार के दायित्वों का निर्वाह भी करना हैं। जैसे मातृपितृऋण, समाजऋण, राष्ट्र का ऋण आदि। अर्थात केवल स्वयं के सुख का विचार नहीं करना है, कुटुंब - समाज - राष्ट्र से जो पाया है उसकी पूर्ति करना आवश्यक बताया गया है।

दूसरे चरण की समाप्ति होते समय मनुष्य यह समझने लगता है कि अब उसकी शक्ती कम हो रहीं है, युवावस्था में जैसा रुप था वह बदल गया है और अनेकों के मन से इच्छा - वासनाएँ धीरे धीरे कम होने लगती है। ऐसे मे मनुष्य के लिए तीसरा आश्रम बताया गया है, वानप्रस्थाश्रम।
इस आश्रम में पति - पत्नी साथ ही रहते हैं किंतु धीरे धीरे गृहस्थी से मन की आसक्ती कम करना, अगली पिढी को निर्णय का अधिकार सौंपना और मन को निवृत्ति को ओर ले जाना अपेक्षित है।

चौथा और अंतिम आश्रम यद्यपि सबके लिए संभव नहीं है, किंतु जो व्यक्ती वानप्रस्थाश्रम इतनी आत्मशक्ति अर्जित करता है कि जो गृहस्थाश्रम के नातेसंबध व सुखोपभोग से मन को अलिप्त कर सकता है वह संन्यास ले सकता है।

कितनी सुंदर और विचारपूर्वक बनाई गई व्यवस्था हैं ! इस व्यवस्था पर हम कुछ अन्य पंथों में प्रचलित व्यवस्था के संदर्भ में विचार कर सकते हैं और श्रीमद् भगवद्गीता के उपदेश के आलोक में भी ..

इसलिए हम इस विषय पर और अधिक विचार करेंगे। वैसे भी व्यक्ती का चरित्र और समाज की नीतिमत्ता का संबध और सामाजिक उन्नयन की विश्वकल्याण के लिए आवश्यकता के हमारे विषय से यह सुसंगत ही है !

गर्व से कहे 👇🏼 
हिंदु धर्म की जय 🚩 
भारतमाता की जय 🇮🇳

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