#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ९१- दि. २३.०८.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग  ९१ : दि. २३.०८.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

चाणूर और मुष्टिक का अखाड़े में वध करने के पश्चात कृष्ण ने कंस का भी वध किया और पुनः कंस के पिता उग्रसेन का राज्याभिषेक किया गया।

श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में बहुत वर्षों के पश्चात यह बताया कि 'कर्म करते रहना चाहिए किंतु फल की कामना नहीं रखनी चाहिए', परंतु इसके उदाहरण वह अपने जीवन में देते ही रहे हैं।

जैसे, कंस का वध उन्होने किया था इसलिए कंस के राज्य पर वह अधिकार जता सकते थे, स्वयं ही राजा बनने की बात करते तब भी सभी लोग सहर्ष उसे मान लेते। अथवा वह अपने पिता वसुदेव को भी राजा बना सकते थे। 
इनमें से कोई भी प्रस्ताव वह रखते तो मथुरा की प्रजा तो आनंदित ही होनेवाली थी।
कंस का आतंक, उसके अत्याचार इतने भीषण थे की उससे मुक्ति दिलाने के कारण उसके पिता उग्रसेन भी कृष्ण के आभारी ही रहे होंगे। वह भी कृष्ण के राज्याभिषेक के लिए मान जाते !
.... किंतु कृष्ण ने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होने उग्रसेन को उनका राज्य लौटा दिया और स्वयं ऋषि सांदिपनी के आश्रम में विद्याभ्यास (education= शिक्षण) के लिए चल पडे।

विश्व के इतिहास में ऐसे कितने उदाहरण है कि जिसमे जीतनेवाले योद्धा ने स्वयं राजा ना बनते हुए किसी और को राज्य सौंप दिया हो !

कृष्णचरित्र में ऐसे उदाहरण आगे भी हैं जब उन्हे राजा बनने की और सभी अधिकार प्राप्त कर निरंकुश (किसी और के 'अंकुश = नियंत्रण / स्वामित्व' के बिना अर्थात पूर्ण रुप से ) सत्ताधीश (राजा= Ruler) बनने का अवसर था, परंतु कृष्ण को ऐसा कोई मोह कभी था ही नहीं ! 
वह प्रजा के, समाज के हित के लिए कार्य करते थे, स्वार्थ के लिए नहीं ! और प्रजा का कल्याण करने के कारण अथवा उसकी आड में स्वयं कुछ पा लेना / दूसरे से कुछ छीनना / साम्राज्य विस्तार करना यह कृष्ण की नीति कभी भी नहीं रही हैं।

हिंदु धर्म में जिन देवताओं को पूजनीय माना जाता हैं उनके व्यक्तित्व की यही विशेषता हैं कि वह स्वार्थ से उपर उठकर मात्र समाज के कल्याण की ही सोचते हैं ।
कृष्णचरित्र की विशेषता यह हैं कि श्रीमद्भगवत् गीता के प्रत्येक उपदेश को श्रीकृष्ण के जीवन को सामने रखकर परखा जा सकता हैं !
उन्होने जो कहा वही किया है और जो किया वही कहा हैं ❗ 
गीता के तत्वज्ञान का साक्षात प्रतिबिंब श्रीकृष्ण का जीवन है🙏🏼

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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