#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ११६ - दि. १७.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ११६: दि. १७.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
पिछले भाग में हमने देखा था की समाज के सामने आदर्श रखने के लिए कृष्ण स्वयं को तपाते हैं और उनके परम भक्त पाण्डवों ने भी उन्ही का अनुकरण किया हैं।
अर्जुन द्वारा बारह वर्षों का वनवास इसी का उदाहरण हैं। पाँचो पाण्डव द्रौपदी के पति थे। ऐसी स्थिति में पति - पत्नी का दांपत्य जीवन सुखी और तनावरहित रहने के लिए विशिष्ट व्यवस्था (नियम) आवश्यक होते हैं। पाण्डव और द्रौपदी के संबंध में इसके लिए सुझाव देवर्षी नारदमुनि द्वारा दिया गया। इस व्यवस्था के अंतर्गत पाँचो का द्रौपदी के पति के रुप में काल समान रूप से विभाजित किया गया था।
अनुशासन के लिए नियम यह भी था कि किसी भी पाण्डव के द्रौपदी के पति होने के काल में अन्य कोई भी पाण्डव यदि उनका एकांत भंग करते हैं तो उसे बारह वर्ष का वनवास करना होगा।
इंद्रप्रस्थ में पाण्डवों के राज्य में एक ब्राह्मण के गोधन का दस्यूओं (डाकू) के एक गिरोह ने अपहरण कर लिया। ब्राह्मण ने अर्जुन से सहायता की याचना की। अर्जुन तत्काल तैयार होकर शस्त्रागार में पहुँचे और आवश्यक शस्त्र लेकर दस्युओं का पीछा कर उन्हे पराजित किया।
परंतु अर्जुन जब शस्त्रागार में गए तब वहाँ सम्राट युधिष्ठिर व सम्राज्ञी द्रौपदी शस्त्रों का निरीक्षण कर रहे थे। इसलिए उनके एकांतभंग करने के कारण अर्जुन वनवास के लिए प्रस्तुत हुए।
स्वयं युधिष्ठिर और द्रौपदी ने उनसे कहा की उनका एकांत भंग नहीं हुआ हैं क्योंकि वे सम्राट और सम्राज्ञी के रुप में राज्य की युद्धसिद्धता संबधी विचारविमर्श व निरीक्षण के लिए शस्त्रागार में गए थे, वह पतिपत्नी के रुप में अपने शयनकक्ष में नहीं थे।
परंतु अर्जुन नहीं माने।
दोनो ने अर्जुन को समझाया की देवर्षी नारद की व्यवस्था में पतिपत्नी के रतिप्रसंग में बाधा ना डालने की तत्व निहित हैं, राज्यव्यवहार की व्यवस्था देखने के प्रसंग को उससे नहीं जोडना चाहिए।
परंतु अर्जुन तो अर्जुन ही थे, वह धर्म का पालन करने को अपनी बाध्यता मानते थे।
इसलिए उन्होने विनम्रता से केवल यही कहा की नियमपालन में किसी भी प्रकार की छूट वह नहीं चाहते हैं और इसके लिए उन्हे वनवास की अनुमति दी जाए।
यद्यपि इस वनवास में सब पाण्डवों का भाग नहीं था परंतु पाण्डवों की मनोभूमिका समझने के लिए यह प्रसंग महत्वपूर्ण हैं !
इस सारे प्रसंग से अर्जुन का चरित्र और उज्वल हुआ हैं, किंतु धर्म को स्थूल रूप से समझकर उसका उपरी अनुसरण अर्जुन ने नहीं किया। उन्होने धर्मपालन को अपने कर्तव्य मानकर बारह वर्ष का वनवास काल स्वयं स्वीकार किया। और उनके कर्मों को श्रीकृष्ण ने भी अनुमति दी इसी से स्पष्ट होता हैं कि अर्जुन के व्यवहार को उन्होने भी धर्म के अनुकूल ही माना था।
हम इसपर विचार करते रहेंगे।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय
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