#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ११० - दि. ११.०९.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ११०: दि. ११.०९.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

ईश्वरी छत्रछाया के उपरांत भी धार्मिक, न्यायमार्गी व्यक्तियों जीवन में संकटों की मालिका और अधर्मी व्यक्तियों के लिए ऐश्वर्य, सत्ता व सुखसाधनों की अमर्याद उपलब्धता मन को भ्रमित करती हैं।
हम सोचते हैं कि ऐसे में न्याय, सत्य और धर्म का मार्ग श्रेष्ठ क्यों है ?
और क्यों हैं ईश्वर की कृपा का इतना महत्व ?

ऐसे प्रश्न जब मन को त्रस्त करते हैं तब हमें हमारे सनातन हिंदु धर्म में जीवन के विषय में जो सत्य बताया गया हैं उसका स्मरण करना आवश्यक होता है।

अन्य धर्मों में 'शरीर' को ही जीवन माना जाता है। व्यक्ति के पाप - पुण्य, सुख - दुख, संकट - सुविधा सब कुछ एक मानव जीवन तक ही सिमित माना जाता है। जो कुछ भी होना हैं इसी जीवन में होना है।

सनातन हिंदु धर्म की भूमिका इससे पृथक (different)  हैं।

हम मानते हैं कि आत्मा की यात्रा निरंतर चलती रहती हैं। इस यात्रा में आत्मा शरीर बदलती रहती हैं जिसमें मृत्यु देह की होती है, आत्मा की नहीं! विविध योनियों में से गुजरते हुए अंततः आत्मा मानव योनि में प्रविष्ट होती हैं।

मानव योनि में भी अपने कर्मों के अनुसार एक से अधिक जन्म लेने की आवश्यकता हो सकती है जब तक अपनी श्रद्धा - भक्ति व गुरुकृपा व गुरु के मार्गदर्शन में ईश्वर आराधना के मार्ग से मोक्षप्राप्ति ना हो।

इस सबका अर्थ यहीं है कि सनातन हिंदु धर्म के अनुसार सुख - दुख की व्याख्या एक जन्म तक सीमित नहीं है। यह एक दीर्घकाल तक और अनेक जन्मों तक चलनेवाली प्रक्रिया है।
इसलिए अपने कर्मों के और ईश्वरी कृपाप्रसाद के फल एक जन्म में नहीं देखने चाहिए।

साथ ही ईश्वर द्वारा अपने भक्तों की परिक्षा लेना यह भी भाग होता हैं। और इसके तो अनेक उदाहरण आज के युग में भी पाए जाते हैं जैसे संत ज्ञानेश्वर व उनके भाई - बहन को समाज द्वारा तिरस्कार और बहिष्कार मिला था, संत तुकाराम के पारिवारिक - सांसारिक जीवन में अनेक कष्ट थे, मीराबाई की कृष्णभक्ती का मार्ग भी काँटो से भरा था।

परंतु कठिन परिस्थितियों से गुजरते हुए भी जो ईश्वर पर श्रद्धा कायम रखे, उनकी आराधना में सातत्य रखें और मोह की अवगुंठित (veiled) थालियों को चखने का लोभ संवरण कर (= रोककर) प्राप्त परिस्थिति को ईश्वर का प्रसाद मान स्वीकार करें उनके व्यक्तित्व में, वृत्ती में ठहराव आता हैं ।

इससे स्पष्ट हैं कि पाण्डवों ने उनके उस जीवन में जो कुछ सहा और जो कुछ पाया उसे उनकी उपलब्धियों का अंत नहीं मानना है।

तब फिर श्रीकृष्ण के उनके जीवन में अस्तित्व के क्या मायने (relevance) हैं ?

हम इसपर भी विचार करेंगे क्योंकि यह हमारे जीवन के लिए  भी मार्गदर्शक है !

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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