#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १५९ - दि. ३०.१०.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १५९: दि. ३०.१०.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩 

स्वधर्म पर निष्ठा के लिए बलिदान का एक और ज्वलंत उदाहरण है छत्रपती संभाजी महाराज का।

केवल ३२ वर्ष की अल्प आयु में संभाजी महाराज औरंगजेब की क्रूरता के कारण अत्यंत यातनादायी, अत्यंत भीषण प्रकार से मृत्यु को प्राप्त हुए।

छत्रपती शिवाजी महाराज के समय से स्वराज्य औरंगजेब की आँख का काँटा बना हुआ था। महाराज तो औरंगजेब के हाथ आकर भी निकल गए।
औरंगजेब इस प्रसंग को कभी भी भूल नहीं पाया। 
जीवनभर उसने महाराष्ट्र के इन सुपुत्रों का पराजय करने मनिषा रखी। शिवाजी महाराज की मृत्यु के पश्चात स्वराज्य को मिटाने की औरंगजेब की आकांक्षा ने और जोर पकडा। दख्खन जीतने का अपना सपना पूर्ण होने की आशा अब औरंगजेब के मन में जागृत हुई और वह स्वयं दख्खन जीतने के अभियान पर निकल पडा। दिल्ली के बादशाह ने अपने जीवन के अंतिम २५ वर्ष दख्खन में तंबू में बिताए। वह वापस दिल्ली लौट नहीं पाया। उसका अंत महाराष्ट्र में ही हुआ।

इसी काल में महाराष्ट्र में एक अत्यंत दुखद, वेदनादायी और अपमानास्पद तथापि अभिमानस्पद घटना हुई, औरंगजेब द्वारा संभाजी महाराज की हत्या।

स्वराज्याभिमानी भारतीयों के लिए यह इतिहास का काला अध्याय है। इसे पढ़ना - सुनना वेदनादायी है। किंतु हमे ढाढस बांधकर इस इतिहास को समझना और उसपर विचार करना चाहिए क्योंकि महाराज का बलिदान स्वधर्म के प्रति निष्ठा का जाज्वल्य उदाहरण है।

राजद्रोह के कारण औरंगजेब के सरदार छत्रपती संभाजी महाराज को कैद कर पाए। 
उन्हे उनके निवासस्थान से घसीटकर बाहर लाया गया। मुगलों की छावनी में उन्हे लाते समय एक विशिष्ट प्रकार की तिकोनी टोपी उन्हे पहनाई गई थी जो अपराधियों को ही पहनाई जाती है। यह टोपी पहनाकर उन्हे पूरी छावनी में घुमाया गया और उन्हे देखकर सिपाही उनपर हँसते रहे।
इसके पश्चात उन्हे विदुषकों जैसे कपडे पहनाए गए।
उनके पिताजी छत्रपती शिवाजी महाराज द्वारा उन्हे पहनाई गई कुलदेवी की पवित्र माला उतार कर गले में चुभनेवाले नारियल की काथी (coir) पहनाई गई।
उन्हे एक गंदे से गधे पर पूँछ की ओर मुख कर बिठाया गया और उनका प्रदर्शन कर रास्ते पर घुमाया गया।
प्रदर्शन के समय शत्रु उनपर हँस रहे थे, उन्हे भाले चुभा रहे थे और भौंडे शब्दों में उनका उपहास कर रहे थे।

औरंगजेब ने उन्हे धर्मांतर करनेपर स्वतंत्र करने का प्रस्ताव दिया जिसे संभाजी महाराज ने स्पष्टतः नकार दिया।
साक्षात बादशाह की अवहेलना करने के अपराध में उनकी जिव्हा काटने का आदेश औरंगजेब ने दिया। परंतु महाराज ने अपना मुख बंद कर लिया था जिसे खोलना सिपाहियों के लिए संभव नहीं हो पा रहा था। अब उनकी नाक को दबाया गया। सांस लेने के लिए उन्हे मुँह खोलना पडा। तब हाथ में चिमटा लेकर तैयार खडे हाशमों ने उनकी जिव्हा को खींचकर बाहर निकाला। 
पुनः एक बार उन्हे मुक्तता के लिए धर्मांतरण का प्रस्ताव दिया गया। उन्होने पुनः उसे ठुकरा दिया।
अब आग जलाकर लोहे की छडें (Iron rods) लाल होने तक गरम की गई। महाराज की दोनो तेजस्वी आँखे .. उनमे यह गरम छडें डालकर घुमाई गई और अत्यंत क्रूर पद्धति से उन्हे अंधा बनाया गया।
उनके नाखून खींचकर निकाले गए ।
शरीर की त्वचा अनेक जगहों पर निकल गई थी और तेज शस्त्र उस जगह चुभाकर शत्रु सैनिक उन पर हँस रहे थे।
इसके बाद उनके शरीर के अंग काटे जाते रहे और अत्यंत वेदनादायी पद्धति से उन्हे मार डाला गया।
मृत्युपश्चात उनके देह का भी अपमान किया गया। मृत्यु के पश्चात बैर की समाप्ति का धर्म शत्रु नही मानता था !

इस सारे काल में महाराज के मुख से वेदना का, आक्रोश का एक शब्द भी नहीं फूटा। 
उन्हे दुख और वेदना से आक्रोश करते देखने की बादशाह की इच्छा अधूरी रह गई। 
वह महाराज का शीश अपने सामने नवाना चाहता था किंतु इतनी भयानक स्थिति में भी महाराज का मस्तक बादशाह के सम्मुख कभी भी नहीं झुका !

क्या है इस बलिदान का अर्थ ?
उनकी मृत्यु से समाज को क्या मिला ?
इस प्रकार प्राण गँवाकर स्वधर्म की कैसी सेवा की उन्होने ?

श्रीमद् भगवद् गीता के तीसरे अध्याय, श्लोक ३५ में भगवान ने बताया है कि 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः , परधर्मो भयावह :'। 
अर्थात अपना कर्तव्य करते हुए, अपने धर्म का निर्वाह करते हुए मृत्यु भी श्रेयस्कर है किंतु परधर्म का अंगिकार नहीं करना चाहिए। इसमें 'धर्म' शब्द की अनेक छटाएँ अंतर्भूत हैं क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण को धर्म शब्द का व्यापक अर्थ अपेक्षित हैं। इसमें धर्म यानि सनातन हिंदु धर्म के साथ व्यक्ति का कर्तव्य और दायित्व भी अभिप्रेत हैं। अर्थात समाज जिससे प्रेरणा ले सके और उन पदचिन्हों पर चल सके ऐसा कर्म भी धर्म की व्याख्या का अंग है। 
इसमें मृत्यु का अंधा स्वीकार अपेक्षित नहीं हैं , स्वयं की और अन्य सबकी रक्षा ही अपेक्षित हैं, किंतु दूसरा कोई मार्ग ना रहने पर ऐसी मृत्यु का स्वीकार करना - जो जनमानस में दुख और क्रोध के साथ चेतना का स्फुल्लिंग प्रज्वलित करे - श्रेष्ठ बताया गया है।

भगवान की वाणी से ही जब छत्रपती संभाजी महाराज की धर्मनिष्ठा की पुष्टी हुई हो, तब उसपर पृथक भाष्य की आवश्यकता नहीं है।

परंतु हम सामान्य जन हैं, ना अर्जुन है ना संभाजी महाराज है। हमें बस इतना ही समझना है कि प्रलोभन चाहे जितना भी आकर्षक हो अथवा कष्ट जितने भी असहनीय हो, सनातन हिंदु धर्म की ध्वजा हमें हर स्थिति में फहराती रखनी है !

गर्व से कहे 👇🏼 
हिंदु धर्म की जय 🚩 
भारतमाता की जय 🇮🇳

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