#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १२२- दि. २३.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १२२: दि. २३.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
संस्कारों को कोई पाठशाला नहीं होती..
संस्कार का अभ्यासक्रम नहीं होता हैं..
संस्कारों की कोई एक ही व्याख्या नहीं होती हैं..
धर्माचरण की कोई नियम-पुस्तिका नहीं होती हैं..
यह सब समझने की और मनन - चिंतन करने की बाते हैं..
इनमें लचक / लवचिकता (flexibility) हैं इसलिए परिस्थिति के अनुरूप इसमें बदलाव संभव है। उन परिस्थितियो में संबधित व्यक्तियों का स्वभाव व मनोवृत्ति के अनुसार इसके पालन में भी बदलाव करना संभव हैं।
परंतु इसके मूल में निहित तत्व (underlying principles) जैसे न्याय, धर्म की रक्षा, व्यक्ति की स्वतंत्रता और सम्मान इ . अनेक मुद्दे कालातीत (ageless) हैं।
हम इस विषय को श्रीकृष्ण के जीवन के संदर्भ में देख सकते हैं। उनके जीवन के कुछ प्रसंगों पर विचार करने से स्पष्ट होता हैं कि उन्होने अत्यंत चतुराई से धर्म की रक्षा की हैं और साथ ही कुटुंब के आत्मिय जनों को एकसाथ जोडकर भी रखा हैं यद्यपि वे न्याय के मार्ग से दूर जा रहे थे।
दोनो ही प्रसंग श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलराम से संबंधित हैं। श्रीकृष्ण उनके प्रति आदरभावना रखते थे और कुटुंब के ज्येष्ठ व्यक्तियों का संस्कार भी उनके व्यवहार से छलकता हैं। परंतु श्रीकृष्ण ने वहीं किया जो आवश्यक था।
पहला प्रसंग सुभद्रा के विवाह का हैं।
दुर्योधन और भीम दोनो के ही मल्लविद्या और गदायुद्ध के लिए गुरु बलराम थे। किंतु किन्ही अज्ञात कारणों से उनका झुकाव दुर्योधन की ओर था। इसलिए अपनी बहन सुभद्रा विवाहयोग्य होते ही उन्होने उसका विवाह दुर्योधन से करने का निश्चय किया।
श्रीकृष्ण नहीं चाहते थे की सुभद्रा के साथ यह अन्याय हो क्योंकि दुर्योधन ना केवल अधर्मी, लोभी, सत्ताकांक्षी था बल्कि दुराचारी भी था। इससे सुभद्रा का जीवन दुखों से भर जाता और यादव कुल का भी अहित ही होना था।
परंतु ज्येष्ठ भ्राता की इच्छा का विरोध उन्होने प्रकट रूप से नहीं किया क्योंकि इससे कुटुंब में मनमुटाव होता और यदि बलराम अपनी ही बात पर अडे रहते तो की यादवों में भी फूट पड सकती थी।
इसलिए कृष्ण ने ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न की जिससे सुभद्रा अर्जुन के व्यक्तित्व से पूर्णतः परिचित हो सके।
इसी कारण अर्जुन ने जब सुभद्रा का हरण किया तो वीर क्षत्राणी समान सुभद्रा अपनी रक्षा के लिए सक्रीय नहीं हुई। वह अपने प्रियतम का सानिद्ध्य पाकर और उनकी युद्ध दक्षता को देखकर उनपर और मुग्ध होती गई। यादवों की सेना से लडने के लिए अर्जुन पूर्णतः दक्ष थे।
कुटुंब का विरोध कर अथवा उनके जीवन को भी दाँव लगाकर अपनी इच्छा पूर्ण करने की सीख हमारे देवता तो नहीं ही देते हैं। वह चतुराई से मार्ग निकालने के उदाहरण हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं जिससे समाज में एकता और आपसी प्रेमभाव बना रहे क्योकि आपसी मनमुटाव का फायदा उठाकर शत्रु घर में घुसकर उसे खोखला करते हैं और फिर उसीपर कब्जा कर लेते हैं।
महपुरुषों के जीवन का प्रत्येक प्रसंग हमारा आदर्श बन सकता हैं, हमें बस उस दृष्टी से देखना चाहिए !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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