#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १३४ - दि. ०५.१०.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १३४: दि. ०५.१०.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
श्रीकृष्ण का पाण्डवों से संबध उनकी युवावस्था से प्रारंभ हुआ। तबतक सभी पाण्डवों का अपना अपना स्वभाव - वृत्ती बन गई थी और स्पष्ट भी हो गई थी। यद्यपि विचारों में बदलाव होना, प्रगल्भता की ओर बढना यह निरंतर चलनेवाली प्रक्रिया हैं किंतु मूल धारणाएँ - अपवादों को छोड़कर - साधारणतः कायम रहती हैं।
अर्जुन कुशाग्र बुद्धी के, परम आज्ञाकारी, गुरुजन व ज्येष्ठ व्यक्तियों का आदर करनेवाले और उनके प्रति ऋजु भावना रखनेवाले, कलासक्त, संयमी वृति व प्रगल्भ विचारधारा के थे।
श्रीकृष्ण का स्नेह तो सभी पाण्डवों को मिलता रहा किंतु यह स्पष्ट है कि विभिन्न अलौकिक क्षमताएँ होते हुए भी अर्जुन का व्यक्तित्व जितना नियंत्रित और निर्मल रहा उस कारण श्रीकृष्ण से उनका संबध अधिक गहरा होता गया।
उस युग में वीरों की कमी नहीं थी। अर्जुन जितनी ना सही किंतु सामान्य से कहीं अधिक योग्यतावाले अनेक वीर उस युग में थे। भीष्म जैसे कुछ थे जिनका तो मन भी निश्छल था। किंतु श्रीकृष्ण की छत्रछाया का अर्जुन जैसा सौभाग्य किसी और को नहीं मिल पाया।
क्यों ?
हम सब जानते हैं की रणक्षेत्र में भगवान ने अर्जुन को भगवद्गीता रुप उपदेश किया था। हमें यह समझना आवश्यक हैं कि यद्यपि कुरुक्षेत्र में भगवान ने तत्वज्ञान का सार (summary) बताया है परंतु जीवनभर उन्होने यही सब उपदेश किया हैं और उसे अपने जीवन में साकार भी किया हैं।
अर्जुन में यह योग्यता थी कि वह भगवान के उपदेश को ग्रहण कर उसपर आचरण करें।
श्रीकृष्ण प्रेममय है परंतु वह अनासक्त हैं ❗
श्रीकृष्ण धर्मोन्मुख है परंतु वह धर्मश्रृंखला से बद्ध नहीं हैं ❗
श्रीकृष्ण कर्तव्यपालन के लिए दक्ष हैं किंतु वह फलप्राप्ती के प्रति उदासीन है❗
श्रीकृष्ण के प्रिय शिष्य - सखा अर्जुन का व्यक्तित्व भी इन्ही विशेषताओं से प्रकाशमान हैं।
अर्जुन ने अपने सगेसंबधियों से प्रेम किया, उनका आदर किया, उनके रुप - गुण पर मुग्ध युवतियों से प्रेमविवाह भी किए परंतु गहरे कहीं वह अनासक्त ही थे। तभी वह स्वयंवर में प्राप्त द्रौपदी का अन्य चार भाइयों से भी विवाह स्वीकार कर पाए, अप्सरा उर्वशी का रतिनिमंत्रण नम्रतापूर्वक नकार पाए, राजा विराट ने पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन से करने का प्रस्ताव रखा तब वह उसे पुत्रवधू बनाने का गरिमामय निर्णय ले पाएं, पत्नी चित्रांगदा के कारण मिलनेवाला मणिपुर का राजपद छोडकर अपने भ्राताओं के पास लौट पाए।
भगवद्गीता हमारा परमपवित्र धार्मिक ग्रंथ रहा है। किंतु इसकी रचना का मूल कारण है कुरुक्षेत्र के युद्ध से पूर्व अर्जुन के मन में जन्मा वैराग्य !
युद्धक्षेत्र के शत्रुपक्ष में प्रियजनों को देखकर अर्जुन विव्हल हुए और उन सब के लिए राज्य तो क्या परंतु सर्वस्व त्यागने की व्याकुल भावना से उन्होने शस्त्रत्याग किया।
प्रेमभावना के अधिक्य के कारण सर्वस्व का त्याग कर सामान्य जीवन जीने की तैयारी विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कर रहा था !
आगे भगवान ने उन्हे उपदेश कर कर्म हेतु उन्मुख किया और अर्जुन ने भी धर्मरक्षण की आवश्यकता समझकर युद्धकर्तव्य पूर्ण किया परंतु मूलतः अर्जुन के मन की वह व्याकुलता कितनी सुंदर, भव्य और उदात्त हैं !
अर्जुन की इसी निर्मलता ने भगवान को उनसे बांध रखा होगा।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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