#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १४२- दि. १३.१०.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १४२: दि. १३.१०.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
ईश्वर साधना के विशिष्ट पडावों पर प्राप्त होनेवाली सिद्धियों के संबंध में हमने देखा था कि योगी इन सिद्धियों को भी तटस्थ भाव से देखते हैं और अत्यावश्यक होने पर ही उनका उपयोग करते हैं। उनके लिए आवश्यकता की व्याख्या जगत् कल्याण हैं, न कि स्वयं के लिए लाभ प्राप्ती!
अर्थात योगी अपने व्यवहार से हमारे लिए संकेत देते हैं कि साधनों की उपलब्धता होनेपर भी उनके उपयोग में विवेक होना आवश्यक हैं !
सामान्य मनुष्य के लिए यह अनुकरणीय है। क्योंकि उनके पास सिद्धियाँ नहीं परंतु अधिकार, सत्ता, संपत्ति, प्रभावशाली व्यक्तियों तक पँहुच, महत्वपूर्ण संस्थानों (Government/ other organisations) में पद यह सब हो सकता है। इनका का सदुपयोग किया जा सकता है और दुरुपयोग भी।
समाज के लिए उपयोगी कार्य करना, समाजकार्य करनेवाले व्यक्ति / संस्थानों की यथाशक्ती सहायता करना (आर्थिक और कर्म से भी) जनता का जीवन सरल और सुखमय करना, शिक्षा - स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को बढावा देना, यहाँ तक की घर में काम करनेवाले सहायक, बस्ती में काम करनेवाले चौकीदार / सफाईवाले इ. के प्रति न्यायपूर्ण और सम्मानजनक व्यवहार करना, उन्हे उचित वेतन समय पर देना इ. भी अधिकार, सत्ता और संपत्ति के सदुपयोग की श्रेणी में ही आता है !
हम योगी नहीं बन सकते हैं तो क्या हुआ, हम उनके आदर्शों पर चल तो सकते हैं। और यह भी धर्माचरण ही है।
वस्तुतः धर्म मनुष्य जीवन के प्रत्येक कोने को व्यापता हैं। जिस प्रकार किसी घेरे का अथवा चक्र (circle) का ना कोई आरंभबिंदु होता है ना अंतिम बिंदु, वह तो अखंड होता है, उसी प्रकार धर्म भी एक विशालकाय घेरा हैं जो मनुष्य जीवन को व्यापता हैं। इसकी परिधि (सीमा / मर्यादा) से बाहर जाना संभव तो है किंतु मनुष्य के हित में नहीं हो सकता है।
हम सामान्य मनुष्य योगी तो नहीं बन पाएंगे, तब भी यदि हम उपरोल्लिखित तत्वों के अनुसार आचरण करें तो वह ईश्वर को प्रिय होगा।
वस्तुतः भजन - पूजन - किर्तन - आरती - प्रवचन यह धर्मपालन की मर्यादा नहीं हैं, यह हमारे लिए मनःशांति का साधन हो सकते हैं और यह हमें स्मरण कराते हैं कि मनुष्य जीवन में प्रत्येक विचार - शब्द और कृति धर्म से प्रेरित होनी चाहिए 🙏🏼
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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