#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ९८- दि. ३०.०८.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ९८ : दि. ३०.०८.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

 उत्तरार्ध - २:

द्रौपदी स्वयंवर के लिए केवल अर्जुन के लिए साध्य शर्त रखने का कारण ही यह था की द्रौपदी का स्वयंवर केवल वही जीत सके, अन्य कोई नहीं, ऐसी व्यवस्था करना। तभी द्रौपदी का पाँचो पांडवों की पत्नी बनना संभव था।

अर्थात द्रौपदी को पाँचो पांडवों की पत्नी बनाना यह विचारपूर्वक लिया गया निर्णय था। 
भारत के उस भाग में बहुपतित्व का चलन था। आज भी हिमाचल प्रदेश के कुछ भागों में यह प्रथा पाई जाती हैं। इसमें परिवार के भाइयों की मिलकर एक ही पत्नी होती हैं। वहाँपर यह प्रथा किसी विशिष्ट जाति अथवा समाज की ना होकर सामान्य चलन है (कुछ वर्ष पहले India Today में इस विषय पर ऐसे परिवारों के छायाचित्रों के साथ एक विस्तृत लेख प्रसिद्ध किया गया था।) 

उस युग में बहुपतित्व की प्रथावाला क्षेत्र कदाचित और विस्तृत होगा। परंतु पांडवों को छोडकर उस युग में ऐसा अन्य उदाहरण नहीं पाया जाता है। कारण यह हो सकता हैं कि यह प्रथा राजकुलों में नहीं होगी अथवा समय के साथ समाज के धनी और प्रतिष्ठित वर्ग ने इसे त्याग दिया होगा। परंतु पांडवों की एकजूट कायम रखना यह समाज के लिए, देश के हित के लिए आवश्यक था। इसलिए श्रीकृष्ण ने इस प्रथा के पुनरुज्जीवन का सुझाव दिया होगा।

हमें यह समझना होगा की उनकी इस पहल को स्वीकार करना पांचाल राजपरिवार के लिए और पांचाली द्रौपदी के लिए कितना कठिन रहा होगा ! पांचाल का सुप्रसिद्ध - वैभवशाली राज्य, और उसकी अद्वितीय राजकुमारी पाँच पतियों की पत्नी बनेगी ?

राजा द्रुपद अर्जुन को जामाता के रूप में पाकर प्रसन्न ही होते, परंतु इसके साथ अन्य चार पांडवों से भी अपनी गुणी पुत्री का विवाह करना क्या उनके लिए संकट समान नहीं रहा होगा ?

यहाँ पर भी श्रीकृष्ण की सुझबूझ और प्रगल्भ विचारों से हमारा परिचय होता हैं कि अपने इस विलक्षण प्रस्ताव के लिए उन्होने पांचाल राजपरिवार से और स्वयं द्रौपदी से भी सहमति प्राप्त की!
 
कितना कठिन रहा होगा यह सब.. पुरुषों के लिए एक से अधिक पत्नीयों का चलन विश्व के अनेक समाजों में आज भी हैं किंतु स्त्रियों के लिए पातिव्रत्य का निकष ही एक पुरुष में - जो उनका पति हैं - निष्ठा रखना होता हैं। ऐसे में पाँच पुरुषों का पति के रुप वरण करने की कल्पना भी कितनी कठिन थी !

इसलिए हमें यह मानना होगा की इतनी विचित्र बात केवल श्रीकृष्ण के कहनेपर ही मानी गई होगी।

हम यदाकदा यहीं सुनते - पढते आए हैं कि द्रौपदी के स्वयंवर में विजयी होकर अर्जुन अपने भाईयों के साथ द्रौपदी को भी लेकर अपने आवास पर पहुँचे। उन्होने द्वार पर आकर माता कुंती से कहा कि वह भिक्षा लेकर लौट आए हैं। 
कुंती काम में व्यस्त थी। उसने अपने पुत्रों से कहा की भिक्षा आपस में बाँट लो, और माता की आज्ञा का पालन करने के लिए सभी पांडव द्रौपदी के साथ विवाह करने के लिए विवश हुए।

क्या यह संभव हैं ?
जो पांडव अपनी माता की भक्ती करते थे, अपनी माता के परम आज्ञाकारी पुत्र थे, वह अपनी माता की अनुमति के बिना स्वयंवर में भाग लेने जाएंगे ?
अर्थात माँ को बताए बिना उन्होने विवाह का निर्णय ले लिया और अर्जुन के लिए वधू भी निश्चित कर ली ? 
और कुंती को इसमें से कुछ बताना भी उन्होने आवश्यक नहीं समझा ?

और अर्जुन तो पांडवों में तृतीय पुत्र थे, उनका विवाह युधिष्ठिर ओर भीम से पहले करने की बात कैसे सोची जा सकती हैं ?
क्योंकि प्रतिवेदन (ज्येष्ठ भ्राता से पहले विवाह करना) पाप माना जाता था और कुंती - पांडव ऐसा पापाचरण करेंगे इसकी संभावना नहीं हैं।

इसलिए यह निश्चित हैं की स्वयंवर की शर्त को देखते हुए अर्जुन द्वारा पांडवों की ओर से प्रतियोगी बनना और स्वयंवर में विजय प्राप्त करने पर पाँचो पांडवो के साथ द्रौपदी का विवाह करना यह अत्यंत विचारपूर्वक लिया गया निर्णय था।

इसमें श्रीकृष्ण की दूरदर्शिता के साथ ही स्वार्थरहित समाजकल्याण का हेतु भी उभरकर आता हैं। वह चाहते तो द्रौपदी को अपनी पत्नी बना सकते थे परंतु कृष्ण ने अपने और द्रौपदी के मित्रत्व के संबध को ही बनाए रखा और इतरों के हित का ध्यान रखकर निर्णय लिया।
श्रीकृष्ण की ऐसी ही विशेषताएँ उन्हे पूजनीय बनाती हैं🙏🏼

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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