#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १०९ - दि. १०.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १०९: दि. १०.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
श्रीकृष्ण और पाण्डवों के माध्यम से हम ईश्वर के संबध में कुछ महत्वपूर्ण बातें समझ सकते हैं।
पाण्डव यद्यपि कुरुकुल के राजकुमार थे परंतु उनका जीवन शांति - विलासपूर्ण कभी भी नहीं रहा।
पाण्डु के वन में जाने के कारण अंध धृतराष्ट्र को हस्तिनापुर के राज्य का दायित्व (responsibility) मिला। परंतु उसने अपनेआप को सम्राट मान लिया। आगे उसके सर्वलोभी पुत्र दुर्योधन ने राज्य ही हडप लिया।
बहुत ही छोटी उम्र में पितृछत्र गंवाकर पाण्डव माता कुंती के साथ हस्तिनापुर लौटे। यद्यपि वह राजकुमार थे परंतु उनके लिए हस्तिनापुर के राजकुमारों के अनुरूप कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। एक साधारण से भवन में कुंती अपने अल्पवयीन पुत्रों के साथ रहीं। जहाँ धृतराष्ट्र के पुत्र राजसी ठाठ से जीवन बिता रहे थे, वहीं पाण्डवों का जीवन अभावपूर्ण नहीं था तब भी साधारण तो था ही।
उसके पश्चात दुर्योधन ने भीम की हत्या का प्रयास किया।
युधिष्ठिर के युवराज्याभिषेक के पश्चात भी धृतराष्ट्र, दुर्योधन व उनके हितैषियों ने पाण्डवों के लिए सदैव संकट निर्माण किए, पाण्डवों को वारणावत के लाक्षागृह में जिवित जलाकर मारने का षड् यंत्र रचा, पाण्डवों को भिक्षा देने जैसा खाण्डवप्रस्थ का राज्य दिया, वहाँ पाण्डवों ने इन्द्रप्रस्थ का वैभवशाली राज्य निर्माण किया तब पाण्डवो को द्युत का निमंत्रण दिया और कपटपूर्वक द्यूतनिष्णात शकुनि से खेलनेपर बाध्य किया। इसके बाद द्रौपदी वस्त्रहरण का अत्यंत खेदजनक प्रसंग हुआ।
पाण्डवो ने इसके पश्चात तेरह वर्ष अपने राज्य से - सगे संबंधियों से दूर, माता कुंती से बिछुडकर वन में और मत्स्य देश में अज्ञातवास में बिताए।
इतनी कठिनाइयों के पश्चात भी अंततः पाण्डवों को उनका राज्य मिला ही नहीं, उन्हे इसके लिए कुरुक्षेत्र पर युद्ध करना पडा।
अंततः इस युद्ध में पाण्डव विजयी हुए परंतु उसके पश्चात भी उनपर दुखों का पहाड ही टूट पडा था।
अभिमन्यु (अर्जुन - सुभद्रा का पुत्र), घटोत्कच भीम - हिडिंबा का पुत्र), इरावान (अर्जुन - उलुपी का पुत्र) इनकी मृत्यु युद्ध के दौरान ही हुई थी। परंतु जिस दिन युद्ध समाप्त हुआ उसी दिन अश्वत्थामा ने मातुल (मामा) कृपाचार्य के साथ मिलकर पाण्डवो के सभी पुत्रों की धोखे से हत्या कर दी। इनमें दौप्रदी के पाँचो पुत्र प्रतिविंद्य (युधिष्ठिर पुत्र), सुतसोम (भीम पुत्र), श्रुतकर्मा (अर्जुन पुत्र), शतानिक (नकुल पुत्र) और श्रुतसेन (सहदेव पुत्र) इनके साथ ही यौद्धेय (युधिष्ठिर - देविका का पुत्र), सर्वग (भीम- बलन्धरा का पुत्र), निरमित्र (नकुल - करेणुमती का पुत्र) सुहोत्र (सहदेव - विजया का पुत्र) थे। साथ ही युद्ध में पाण्डवों के सेनापती और द्रौपदी के सगे भाई धृष्टद्युम्न को भी मार दिया।
सारांश, पाण्डवों ने अपने संपूर्ण जीवनकाल में विपदाओं का ही सामना किया हैं।
जिनके मार्गदर्शक और संरक्षक साक्षात श्रीकृष्ण थे उनके जीवन में निरंतर संकट आते रहे, उनके लिए वनवास और अज्ञातवास का समय भी कष्टपूर्ण था, उन्हे अपने प्रिय पुत्रों की मृत्यु की पीडा का सामना करना पडा।
दूसरी ओर दुर्योधन है जो अधिकार ना होते हुए भी हस्तिनापुर के राज्य का स्वामी होने का सुख भोगता रहा।
जब ऐसा हैं तब भगवान विष्णु के अवतार की छत्रछाया में रहने का क्या उपयोग हैं ?
ईश्वरी कृपा के उपरांत भी जीवन यदि संकट और दुखों से ही भरा हुआ हो तो ईश्वरी कृपा का अर्थ क्या है ?
अधर्म, अन्याय और अत्याचार के मार्ग पर चलनेवाले यदि सुख भोगते रहे तो फिर श्रीकृष्ण की उँगली पकडकर धर्म और न्याय का जयजयकार करते रहने की आवश्यकता हैं क्या ?
प्रश्न जितने गहन हैं, उत्तर उतने ही सुंदर हैं जिसपर हम चर्चा करते रहेंगे.....
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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