#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १४३ - दि. १४.१०.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १४३: दि. १४.१०.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
जीवात्मा की पाँचवी और सबसे अंदरूनी परत है आनंदमय कोश। इसके भीतर आत्मा है और मोक्ष प्राप्त होने का अधिकार (उसके कर्म और साधना के आधार पर) उसके लिए अगला और अंतिम पडाव है।
बताया जाता हैं कि आनंदमय कोश तक पहुँचनेवाले योगी के मन में 'मै' अर्थात अहंकार की भावना नहीं होती। ऐसे योगी सदैव आनंदमूर्ति - प्रेममूर्ति होते है। उनमें अहंकार नहीं होता , अपने पराए का भेद वह समझते नहीं , क्रोध - द्वेष - तिरस्कार यह भावनाएँ उन्हे नहीं छूती हैं। वह सबको समान मानते है , सबसे प्रेम करते है, क्षमा करना उनके मन का सहजभाव होता है ..
बहुत कठिन, असंभव सा लगता हैं यह सब । क्योंकि हम सब पढिक ज्ञानी हैं किंतु आनंदमय कोश तक जिसकी पँहुच हैं वह आत्मज्ञानी हैं ।
ऐसे योगी के लिए भौतिक जगत मिथ्या है ..
वह नरदेह को आत्मा की मोक्ष तक चलनेवाली यात्रा के एक अत्यंत छोटे रुप की दृष्टी से देखते है..
उनके लिए देह की उपलब्धियाँ कोई महत्व नहीं रखती हैं, वह देह को साधना का वाहन मानते है..
ईश्वर से एकाकार होकर मोक्षप्राप्ती यहीं उनका एकमात्र लक्ष्य होता हैं ..
परंतु इसके लिए गुरुकृपा अत्यावश्यक हैं !
गुरु का मार्गदर्शन , उनका प्रेम और उनकी कृपा ही आनंदमय कोश तक ले जा सकती है !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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