#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १२१- दि. २२.०९.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १२१: दि. २२.०९.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

श्रीकृष्ण का जीवन अनेक अर्थों में मार्गदर्शक हैं। अपना अवतारकार्य करते समय विविध प्रसंगो में उनकी कृति को समझना हमारे जीवन के लिए प्रथप्रदर्शक (guiding light) होगा।
हम कुछ ऐसे प्रसंग देखेंगे जिस में श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व के विविध पहलु उजागर होते हैं।

पहला प्रसंग हैं इंद्रप्रस्थ में पाण्डवों द्वारा राजसूय यज्ञ के आयोजन का। 
पाण्डवों के हितैषी, मार्गदर्शक अथवा एक प्रकार से अभिभावक के रुप में श्रीकृष्ण इस यज्ञ के लिए उपस्थित हैं। पाण्डवों की माता कुंती यद्यपि कृष्ण की बुआ हैं, किंतु वे श्रीकृष्ण के वास्तविक रुप को जानती हैं इसलिए कृष्ण के प्रति उनका वात्सल्यभाव भी हैं और भक्तिपूर्ण लीनता भी हैं (कुंती और श्रीकृष्ण के विषय में एक रोचक बात बताई जाती हैं की कुंती ने श्रीकृष्ण से अनुरोध किया था कि उन्हे जीवन में दुख ही दुख मिलते रहें। क्योंकि सुख में साधारणतः हमें ईश्वर का विस्मरण होता है परंतु दुख का समय केवल ईश्वर नाम की माला जपते जपते ही पार किया जा सकता हैं। इसलिए कुंती ने दुख की याचना की थी जिससे उन्हे ईश्वर का सदैव स्मरण रहे ! कुंती भी अपनेआप में एक अद्भुत व्यक्तित्व है!)

राजसूय यज्ञ में 'अग्रपूजा' (यज्ञ के निमित्त महान व्यक्ति का आदर सत्कार व पूजन) का मान किसे दिया जाए यह प्रश्न था। पाण्डवों के मन में निःसंशय कृष्ण का ही नाम होगा, किंतु वे विनम्र हैं, मर्यादा का पालन करनेवाले हैं, इसलिए उन्होने अपनी ओर से पहल नहीं की। क्योकि यज्ञमंडप में पितामह भीष्म उपस्थित हैं। दुर्योधन के कारण राज्य का बंटवारा हुआ हैं परंतु पाण्डवों के मन ने परिवार का बंटवारा नहीं किया हैं। वे कुल के ज्येष्ठ पितामह की आज्ञा का पालन करने का ही विनम्र भाव रखते हैं।
इधर पितामह ने भी अग्रपूजा के सम्मान के लिए कृष्ण का ही नाम लिया।

दुर्योधन के क्रोध का अंत नहीं था। विविध राज्यों के सामर्थ्यशाली, धनी राजाओं को छोड एक अदने से ग्वाले की अग्रपूजा ? 
उसने विरोध तो किया ही साथ ही अनर्गल (irrelevant & insulting) बातें भी की। 'चोर चोर मौसेरे भाई' इस नाते शिशुपाल भी दुर्योधन का साथ देने लगा। 
शिशुपाल की माता को श्रीकृष्ण ने वचन दिया था कि वह उसके १०० अपराधों की क्षमा करेंगे, परंतु १०१ वें अपराध पर उन्हे शिशुपाल का वध करना ही होगा।
राजसूय यज्ञ के मंडप में शिशुपाल की अपमानजनक बातें कृष्ण धैर्यपूर्वक सुनते रहे। परंतु १०१ वें अपराध पर उन्होने शिशुपाल का शिरच्छेद कर दिया।

सुनने - पढने में यह एक कहानी मात्र हैं परंतु इसमें गर्भित श्रीकृष्ण का संयम हमारे लिए अनुकरणीय हैं !

जरा सोचिए, कोई हमारा एक अपराध करता हैं तो हमें कितना मानसिक कष्ट / क्रोध होता हैं ! और यहाँ श्रीकृष्ण शिशुपाल के १०० अपराध सह रहें हैं।

संयमशीलता का यह परमोच्च उदाहरण हैं जिससे श्रीकृष्ण यह सीख दे रहें हैं कि कोई भी व्यक्ति कितना ही दुष्ट क्यों ना हो, हमें उसे सुधारने के अवसर पुनःपुन्हा देते रहने चाहिए, चाहे हमे इसलिए अपमान ही क्यों ना सहने पडे !

साथ ही वह यह भी अधोरेखित कर रहें हैं कि एक मर्यादा के पश्चात क्षमा नहीं, बल्कि दुष्टों का पारिपत्य (विनाश) ही करना चाहिए !
इतने स्पष्ट मार्गदर्शन के कारण ही श्रीकृष्ण हमारे पथप्रदर्शक बने हुए हैं !

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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