#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ११२ - दि. १३.०९.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ११३: दि. १४.०९.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

उत्तरार्ध :

ईश्वर पर श्रद्धा मनुष्य के गुणों का संवर्धन करती हैं। इसीसे मनुष्य को तुलनात्मक स्थितप्रज्ञता से जीवन के उतार चढावों को पार कर अंतत: ईश्वर के निकट जाना संभव होता हैं इसका उदाहरण पाण्डवों में देखा जा सकता है।

मूलतः उनकी वृत्ति सात्विक ही थी। माता कुंती ने भी उन्हे संयम के ही संस्कार दिए थे। 
किंतु प्रत्येक पाण्डव का स्वभाव भिन्न था। इस भिन्नता को एकता के सूत्र में बांधने और उन्हे प्रत्येक स्थिति में संतुलित रखने के लिए पाण्डवों की ईश्वर में श्रद्धा और आस्था यहीं कारण है। 
और उन्हे तो साक्षात श्रीविष्णु के अवतार श्रीकृष्ण का सहवास और मार्गदर्शन मिलता रहा। इस कारण उनसे अनजाने ही प्रमाद (mistake) होने की संभावना भी जाती रही।
परंतु यह सब सहजता से नहीं हुआ हैं। 
जैसे सोना अग्नि में तपने के पश्चात ही अपनी चमक प्राप्त करता है उसी प्रकार पाण्डवों ने जीवन के प्रत्येक पडाव पर कठिन से कठिन परीक्षाएँ दी थी। 
इनमें शरीर के लिए कष्ट थे, मन के लिए यातनाएँ और अपमान थे, अनीति का साथ देनेपर ऐश्वर्य और सुविधाओं के प्रलोभन थे और नीतिमत्ता व न्याय का आग्रह धरने पर छोटी से छोटी वस्तुओं के अभाव के प्रसंग थे, अपनों से बिछडकर दीर्घकाल व्यतीत करने का पीडादायी काल था (इसपर हम अगले भाग में चर्चा करेंगे क्योंकि मनुष्य जीवन की कठिनतम परिक्षाओं में यह आता हैं। ऐसा होने पर भी पाण्डवों ने अपने धर्म का ही निर्वाह किया। क्योंकी इसकी जड में ईश्वरभक्ती और धर्मनिष्ठा थी। परंतु यह परीक्षाएँ कितनी कठिन थी यह समझना हमारे लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हम इससे अपने जीवन के कठिन प्रसंग निभा पाएंगे)।

पाण्डवों के वनवास काल में अपने ऐश्वर्य के प्रदर्शन कर उनकी साधनहीन (दुर्योधन की दृष्टी से दरिद्री) स्थिति उन्हे जताकर उनका अपमान करने के लिए दुर्योधन ने द्वैतवन में घोषयात्रा का आयोजन किया। किंतु अपने बंधु - बांधव , मित्र के कुटुंब सहित संपत्ति का भोंडा प्रदर्शन कर पाण्डवो को लज्जित करने की दुर्योधन की योजना असफल रहीं। उनके मर्यादाहीन व्यवहार के कारण वहाँ चित्रसेन गंधर्व की सेना ने सबको बंदी बनाया।
पाण्डव चाहते तो तटस्थ रह सकते थे। परंतु उनकी सोच गरिमामय थी। कुल का अपमान वे नहीं सह सकते थे। उन्होने चित्रसेन की सेना से लड़कर दुर्योधन आदि को मुक्त किया।

कोई सोच कर देखें की जिस दुर्योधन ने कुरुओं की राजसभा में कुलवधू द्रौपदी का वस्त्रहरण करने का कुटिल कृत्य किया था, उसे क्षमा कर उसकी रानियाँ व सगे संबंधियो सह उसे शत्रु से बचाना कितना महान कर्म है !

इसके पश्चात भी कौरव-पक्षियों के कारस्थान रुके नहीं थे।
वन की कुटिया में द्रौपदी को अकेली देखकर जयद्रथ ने द्रौपदी का अपहरण किया।
सिन्धु नरेश जयद्रथ कौरवों की बहन दुःशला का पति था, नाते से द्रौपदी का ननदोई।
जयद्रथ ने इस नाते का मान नहीं रखा परंतु पाण्डव अपनी बहन को नहीं भूले ! 
उन्होने द्रौपदी की रक्षा कर ली परंतु जयद्रथ को जीवदान दिया क्योंकि वह उनका बहनोई था और पाण्डव बहन की गृहस्थी उजाडने का पातक नहीं करना चाहते थे।

सोचिए, पत्नी के सतीत्व को कलंकित करने का प्रयत्न करनेवाले बहनोई को क्षमा करनेवाले पाण्डवों की क्षमाशीलता किस कोटी की रही होगी!

यह केवल दो उदाहरण है पाण्डवों के व्यक्तित्व, उनकी सोच और उनके व्यवहार की गहराई में आसीन प्रगल्भता के ! ऐसी क्षमाशीलता केवल मन से ईश्वर के निकट रहनेवाले व्यक्तियों में ही हो सकती है !

निःसंशय यह पाण्डवों के अपने जन्मजात और पूर्वजन्म के पुण्यकर्मों के फल के कारण ही हुआ था, किंतु इसमें भगवान श्रीकृष्ण का सहवास और उनके उपदेश का प्रभाव भी स्पष्ट है ! 

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳 

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