#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १३६ - दि. ०७.१०.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १३६: दि. ०७.१०.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
 
सनातन हिंदु धर्म की पुनर्जन्म संबधी मान्यताएँ और अन्य धर्मियों की मान्यताएँ भिन्न हैं।
इजिप्त, चीन आदि देशों में मृतदेह को मिट्टी में अथवा जमीन के नीचे छोटा - मोटा भवन बनाकर गाडने के उदाहरण हैं (Burial)। ऐसे में मृतदेह के साथ मनुष्य देह में उपयोग की जानेवाली साधनसामग्री रखने की भी प्रथा हैं। इनमें कपडे, अलंकार, बहुमुल्य बर्तन आदि पाए गए हैं। कल्पना कदाचित यह थी की इन सबकी आवश्यकता मृत व्यक्ती को Day of final judgement अर्थात ईश्वर द्वारा अंतिम न्यायदान के दिन तक होगी।
अर्थात अन्य धर्मी यह मानते हैं कि व्यक्ती का जीवन मृत्युपश्चात थम जाता हैं और हम मानते हैं की प्रत्येक शरीर की मृत्यु उसकी आत्मा के लिए नए द्वार के खुलने का साधन हैं।

हमारे हिंदु दर्शन के अनुसार हमारे शरीर (Physical existence = body) को 'अन्नमय कोष' कहा जाता है। शरीर की भौतिक आवश्यकताएँ होती हैं जैस अन्न, जल, वस्त्र, औषधी आदि (यद्यपि योगमार्ग में विशिष्ट पडाव पार करनेपर यह भी आवश्यक नहीं होता हैं भले ही उस व्यक्ति के भौतिक शरीर का अस्तित्व कायम हो)।

मृत्यु के पश्चात अन्नमय कोष नष्ट होता हैं परंतु तब जब शरीर का दाहसंस्कार किया जाए। 

पुरातन काल में मृत शरीर का दाहसंस्कार मृत्यु के एक प्रहर में करने का बंधन था। तब शीतपेटी की व्यवस्था नहीं थी इसलिए मृतदेह समय से नष्ट करने की आवश्यकता हुआ करती थी यह व्यावहारिक कारण था।
परंतु हिंदु दर्शन के अनुसार यह इसका एकमात्र कारण नहीं हैं। आधुनिक काल में वर्षों और शतकों तक मृतदेह को संभालकर रखने की सुविधा उपलब्ध हैं, फिर भी 'एक प्रहर में दाहसंस्कार' का बंधन कायम है।

अग्निसंस्कार करना और विशिष्ट समय में करना इसके लिए दो कारण महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

पहला कारण मनुष्य की भावनाओं से संबधित हैं। जबतक मृत शरीर का अस्तित्व हैं तबतक उस व्यक्ति की मृत्यु को स्वीकार करना कदाचित कठिन हो जाता हैं, इसलिए दाहसंस्कार का महत्व हैं कि शरीर नष्ट होने के पश्चात सगेसंबधी मृत्यु को वास्तव में स्वीकार कर पाते हैं। असमय और आकस्मिक मृत्यु की स्थिति में यह विशेष रुप से सत्य होता हैं।

दूसरा कारण यह है कि हम तो आत्मा की बात कर रहे है जो नष्ट नहीं होती हैं, तो हिंदु मान्यता के अनुसार जबतक शरीर नष्ट ना हो तबतक आत्मा की भी उसमें आसक्ती शेष होने की संभावना बनी रहती हैं। 
जो शरीर आत्मा ने त्याग दिया है उसके प्रति आत्मा को अपनत्व की भावना रहेगी, मृत शरीर के निकट शोक करनेवाले परिजनों के प्रति मोह रहेगा और इस प्रकार आत्मा अपनी आगे की यात्रा के लिए बढ नहीं पाएगी, वह अपने त्यागे हुए शरीर से ही बद्ध रहेगी। 
इसलिए उस मोह से आत्मा को मुक्त करने के लिए भी विशिष्ट समय में देह के अग्निदाह का नियम बनाया गया हैं।

यह विषय अत्यंत विस्तृत हैं परंतु श्रद्धालु सनातनी हिंदु के रुप में हम इसे समझने का यत्न करते रहेंगे🙏🏼

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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