#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १२८ - दि. २९.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १२७: दि. २८.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
अनेक व्यक्ती अपने परिजन, सगे - संबधी, मित्र आदि के व्यवहार से दुखी होते हैं।
यह वे लोग होते हैं जिनके हम प्रेम करते है , उनके लिए
आस्था रखते हैं किंतु वह हमारी उपेक्षा करते हैं।
अथवा यह भी होता है कि वह हमारे प्रति सद्भावना रखते हैं किंतु उन्हे यह ज्ञात ही नहीं होता कि उनके व्यवहार से हमें कष्ट हो रहा है।
कई बार यह भी होता हैं कि ऐसे सब लोग हमसे अच्छा व्यवहार करते हैं किंतु इनका आपस में मनमुटाव होता हैं जो हमें दुखी कर देता हैं।
ऐसी स्थिति में प्रायः हम औरों की ओर देखते है। तब हमें लगता हैं कि वह सारे लोग सुखी हैं क्योंकि उनके प्रियजन उन्हे सुख दे रहें हैं।
इस विचार की खाई में गिरने से हमारा मनोबल टूट सकता हैं, हम मन से असंतुलित हो सकते हैं और परिणामतः दुखों की श्रृंखला अधिक लंबी होने लगती है।
तो क्या यह स्वाभाविक नहीं हैं ?
है तो, किंतु होना नहीं चाहिए।
ऐसी स्थिति झेलनेवाले हम अकेले नहीं है। सामान्य जन को ही नहीं, हमारे देवपुरुषों को भी ऐसी स्थिति झेलनी पडी थी। तब उनका व्यवहार कैसा था यह देखने से हमें मार्गदर्शन मिल सकता हैं और यह भी धर्मसंस्कार का ही भाग हैं। क्योंकि धर्म का अर्थ तत्वज्ञान की गहन चर्चा तक ही सिमित नहीं हैं, धर्म हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को स्पर्श करता हैं और हमारा प्रत्येक विचार और कृति धर्म से ही परिचालित (Driven) होनी चाहिए।
यह सब श्रीराम, श्रीकृष्ण के जीवन में भी हुआ था। उन्होने संतुलित विचार और व्यवहार से मानवसमाज के लिए आदर्श प्रस्थापित किए !
श्रीराम के पिता दशरथ में कामभावना का अधिक्य था। उनकी तीन रानियों के अतिरिक्त उनका विशाल अंतःपुर भी था। किंतु श्रीराम प्रत्येक भावना की मर्यादा रखने के पक्ष में थे। उन्होने पिता का प्रकट विरोध नही किया था किंतु स्वयं एकपत्नीव्रत को घोषित रुप से स्वीकार किया।
पिता की पद्धति से वह दुखी अवश्य होंगे, उन अनेकों नारियों के मन की पीडा से व्यथित रहे होंगे। सोचिए, अपने प्रियजन द्वारा किया जा रहा अन्याय उनके लिए कितना कष्टदायी रहा होगा।
श्रीकृष्ण के लिए बलराम कई बार समस्याएँ खडी करते थे। वह दुर्योधन के पक्षपाती थे और श्रीकृष्ण को जबतब उनके विचित्र निर्णयों को पलटाने की कसरत करनी पडती थी, वह भी अपने दाऊ का पूर्ण सम्मान रखकर !
वैसे श्रीकृष्ण के लिए समस्याएँ खडी करनेवाले अनेक थे।
मातुल कंस था ..
शिशुपाल था जो श्रीकृष्ण की बुआ का पुत्र था। स्वयं तो जब भी अवसर मिले तब श्रीकृष्ण का पुरजोर विरोध करता था। उपर से जरासंध के गुट का निष्ठावान सदस्य था। वही जरासंध जिसे श्रीकृष्ण फूटी आँख नही सुहाते थे और जिसने श्रीकृष्ण को मारने के लिए मथुरा पर १७ बार आक्रमण किया था..
दुर्योधन जो उनका समधी था ..
यादवों में सात्यकी कृष्णभक्त थे, कृतवर्मा भी कृष्णभक्त ही थे परंतु दोनो की एकदूसरे से बिलकुल नहीं बनती थी। जहाँ सात्यकी धनुर्विद्या के लिए अर्जुन का शिष्य था वहीं कृतवर्मा को दुर्योधन से लगाव था। इसलिए यह दोनो यादवों में फूट का कारण बने थे..
सत्राजित ने तो उनपर स्यमंतक मणि की चोरी का ही आरोप लगाया और श्रीकृष्ण को अपना निरपराधित्व सिद्ध करना पडा था..
इधर पत्नी के मायकेवाले अलग प्रकार की समस्या थे। रुक्मिणी का भाई रुक्मी जरासंध व शिशुपाल के गुट में था इसलिए उसे श्रीकृष्ण से अप्रिती थी ..
सारांश, श्रीराम और श्रीकृष्ण को भी उनके सगेसंबधी, मित्र इ. ने बहुत मानसिक दुख दिए थे। परंतु उन्होने ना अपना संतुलन खोया, ना अपने भाग्य को कोसा।
उन्होने अपना सहज माधुर्य और प्रेमपूर्ण व्यवहार कायम रखा।
हमारे लिए यह सब कठिन अवश्य हो सकता हैं परंतु असंभव नहीं !
परिक्षा के प्रत्येक समय हम इन देवपुरुषों का स्मरण करें तो जीवन के कठिन पडाव पार कर पाएंगे।
भक्ती भजन - किर्तन में भी है और पूजा - आरती में भी, और इस प्रकार मानसिक यातनाओं को झेलकर भी सहज मधुरता कायम रखना भी भक्ती ही है ❗
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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