#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ११५ - दि. १६.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ११५: दि. १६.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
दुर्योधन ने कपट से युधिष्ठिर को दूत में हराया। द्यूत का निमंत्रण देते समय यह नहीं बताया था की दुर्योधन के प्रतिनिधी के रुप में शकुनि खेलेंगे जो द्यूत में निष्णात थे।
इसके पश्चात कुरुओं की राजसभा में अघटित घटनाएँ घटी थी। कुलवधू द्रौपदी का सार्वजनिक अपमान हुआ। पाण्डवों को दास्यता से मुक्त करने के लिए बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास की शर्त रखी गई।
बारह वर्षों के वनवास काल में पाण्डव एक स्थान पर रहनेवाले नहीं थे इसलिए उनके पुत्रों की शिक्षा का उचित प्रबंध करने की समस्या हो सकती थी।
वनगमन के संबध में द्रौपदी का निर्णय स्पष्ट था। उसने पाण्डवों के साथ जाने का निश्चय किया।उसके पाँचो पुत्र कुछ समय अपने ननिहाल में (पांचाल देश के राजा द्रुपद ) के पास राजधानी काम्पिल्य (आधुनिक उतर प्रदेश में कांपिल नगर) और बाकी समय द्वारका में सुभद्रा के पास अर्थात श्रीकृष्ण के संरक्षण में रहनेवाले थे।
इस व्यवस्था के चलते पाँचो द्रौपदेय कांपिल्य में मातुल (मामा) धृष्टद्युम्न व शिखण्डी से युद्धकला का अध्ययन कर सकते थे।
धृष्टधुम्न भी उस काल के महान गुरु द्रोण के शिष्य थे । युद्धकला में निपुण ❗इसी कारण उन्हे महाभारत के युद्ध में पाण्डवों का सेनापति बनाया गया था।
परंतु द्रौपदी के साथ ही कुंती की और भी बहुएँ थी।
क्या उन्होने नहीं चाहा अपने अपने पति के साथ रहना ?
इस संबंध मे हम तर्क कर सकते हैं ।
कदाचित द्रौपदी को छोड़कर अन्य पाण्डव पत्नियों को अपने अपने पुत्र से बिछुडकर रहना कठिन प्रतीत हुआ हो सकता हैं।
अतः सभी पाण्डव पत्नियाँ अपने अपने पुत्र के साथ मायके गई।
युधिष्ठिर पत्नी देविका - शिवि (आधुनिक पाकिस्तान का खैबर पख्तुनवा प्रांत)
भीम पत्नी बलन्धरा - काशी
अर्जुनपत्नी सुभद्रा - द्वारका
नकुलपत्नी करेणुमति - चेदी देश (आधुनिक भारत का बुन्देलखण्ड)
सहदेव पत्नी विजया - मद्र देश (आधुनिक पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में सियालकोट)
इस व्यवस्था में पाण्डवों की सुविधा के साथ ही भविष्य की कल्पना भी हो सकती हैं। वनवास तो सब साथ में कर सकते थे किंतु इतने विशाल कुनबे के साथ अज्ञातवास निश्चित रुप से असंभव होता। साथ ही श्रीकृष्ण और पाण्डवों के अन्य हितैषी कहीं ना कहीं यह जानते थे की भविष्य में युद्ध होकर रहेगा । इसलिए पाण्डव पुत्रों के लिए युद्धकला का शिक्षण आवश्यक था। वैसे भी क्षत्रियों के लिए वह अनिवार्य ही था !
अभिमन्यू के प्रशिक्षण के लिए स्वयं श्रीकृष्ण थे। उस युग में सबने उन्हे भगवान नहीं माना था परंतु अति उत्कृष्ट युद्धकौशल के धनी और अति उत्तम धनुर्धर तो वे तब भी थे !
अन्य पाण्डव पत्नियों के मायके में उनके पुत्रों की शिक्षा का समुचित प्रबंध किया गया यह स्पष्ट हैं। वह भी तो राज्यकर्ता क्षत्रिय ही थे। आगे युद्ध में विविध व्यूह रचते समय पाण्डव - पुत्रों को जो दायित्व दिए गए और उसे निभाकर भी वह १८ दिन के युद्ध में भी सकुशल रहे इसी से उनकी योग्यता और युद्धकौशल का प्रमाण मिलता है।
परंतु इस संपूर्ण काल में पाण्डव वन में रहे, अज्ञातवास की कठिन परिक्षा देते रहे और द्रौपदी को छोड़कर अपनी पत्नी पुत्रों के सहवास से वंचित रहें।
विचारणीय तथ्य यह है कि धृतराष्ट्र और दुर्योधन ने अबतक उनके साथ इतना अन्याय किया था कि पाण्डव तब यदि विद्रोह करते, वनवास और अज्ञातवास की शर्त ना मानकर युद्ध की घोषणा करते तब भी उन्हे अनेक राजाओं से समर्थन मिल सकता था। सभी राजा तो कौरवों के पक्ष में नही थे।
किंतु पाण्डव तात्कालिक अथवा दूरगामी लाभ के लिए भी अपने धर्म को त्यागते नहीं हैं। इसलिए उन्होने दास्यत्व से मुक्ती के लिए बारह वर्षों का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास स्वीकार किया। इस एक वर्ष में यदि उनकी पहचान हो जाती तो उन्हे पुनः तेरह वर्षों के लिए सह सब दोहराना था।
यह अत्यंत कठिन था परंतु पाण्डव अपने वचन का पालन करते थे, वही उनका धर्म था। इसलिए माता - पत्नी - पुत्र - हितैषी सबसे दूर रहना और वन का कठिन जीवन जीना यह उनका अपना निर्णय था , बाध्यता नहीं थी !
श्रीकृष्ण, जो उनके मार्गदर्शक रहे हैं उन्होने भी इस का विरोध नहीं किया। समाज के लिए यदि आदर्श निर्माण करने हैं तो दिव्यपुरुष और देवपुरुषों को भी परिक्षा की अग्नि में तपना पडता हैं इसका यह उदाहरण हैं।
गीता के तीसरे अध्याय में (श्लोक २२, २३, २४) श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'इन तीनो लोकों में मुझे ना तो कोई कर्तव्य हैं, ना हि कोई अप्राप्त वस्तु हैं, तब भी मैं कर्म करता हूँ। क्योंकि यदि मैं कर्म ना करू तो मनुष्य मेरा ही अनुसरण करेंगे और इससे बडी हानी होगी। इसलिए यदि मेरे कर्म से विन्मुख होने से मनुष्य भ्रष्ट होंगे और तो मैं उनके विनाश का कारण बनूंगा'।
अर्थात श्रीकृष्ण अपने वर्तन से अन्य मनुष्यों के लिए आदर्श निर्माण करते हैं और यहीं अपेक्षा वह पाण्डवों से भी करते हैं।
इस मार्ग में मिलनेवाले कष्टों का विचार कर वह विन्मुख नहीं होते हैं !
इसी से स्पष्ट हैं कि श्रीकृष्ण के सहवास और मार्गदर्शन के कारण पाण्डवों को मूल वृत्ति किस प्रकार सुवर्ण समान दीप्तिमान हुई थी !
यहीं हैं सत्संगति का परिणाम !
और यहीं उपदेश श्रीकृष्ण ने हमें गीता के माध्यम से किया हैं !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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