#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ९३- दि. २५.०८.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ९३ : दि. २५.०८.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

कृष्ण के गुरुकुल में वास्तव्य के संदर्भ में हमने देखा था कि सनातन हिंदु धर्म के विषय में फैलाई जानेवाली भ्रांतियाँ किस प्रकार निरर्थक हैं !
यह तो व्यापक रुप से हमारे सनातन धर्म की बात हुई हैं, अब हम कृष्ण चरित्र में समानता के, प्रेम के उदाहरणों से समझेंगे की गीता में तत्वज्ञान बताने वाले श्रीकृष्ण वास्तविक जीवन में भी कैसे दार्शनिक थे, प्रेममूर्ति थे और भेदभाव से दूर थे।

कृष्ण तो विष्णु का अवतार हैं इसलिए बाल्य - किशोर - तरुण - वृद्ध यह सर्वसाधारण मनुष्य जीवन की अवस्थाएँ उनके संदर्भ में आभास मात्र हैं, वह तो केवल मानव रुप में अवतरित होने के पश्चात मनुष्य रुप बंधनों को मानकर चल रहे थे !
इसलिए उनके जीवन में बाल्यावस्था से ही अनुकरणीय पहलु पाए जाते हैं।

गोकुल में उनका वास्तव्य गोपालों (Milkman = ग्वाला / दूधवाला) में रहा। अब यह तो सामाजिक वर्णव्यवस्था की कोई उच्च श्रेणी नहीं मानी जाती हैं, ना आज के युग में ना त्रेतायुग में ! 
किंतु कृष्ण उनमें भी आनंदपूर्वक रहे। गोकुल के उनके वास्तव्य में उनके सब संगीसाथियों के साथ प्रेममय व्यवहार का वर्णन हैं। वन में सबके साथ बैठकर मिल बाँटकर भोजन करना, सभी मित्रों को एकत्व के, प्रेम के धागे से बाँधना यह कृष्ण के प्रेममय व्यक्तित्व का निर्देशक हैं।

गुरुकुल में विद्याभ्यास के समय सुदामा के साथ मित्रता करना और अनेक वर्षों के पश्चात जब निर्धन सुदामा कृष्ण से मिलने राजमहल पधारे तब उन्हे अपनत्व से मिलना और अपने कुटुंब में आदर का अनुभव देना यह कृष्ण के निच्छल प्रेममय मन को दर्शाता हैं !

विदुर हस्तिनापुर की राजसभा में पदाधिकारी अवश्य थे, परंतु थे तो दासीपुत्र ही ! अर्थात उस युग की मान्यता के अनुसार हीन वर्ण के थे। परंतु कृष्ण ने जन्म पर आधारित भावना कभी रखी ही नहीं हैं, वह तो व्यक्ती के गुणों को पूजते हैं, इसलिए उन्होने विदुर को सदैव आदर दिया क्योंकि विदुर एक विद्वान और पवित्र व्यक्तित्व के धनी थे !

कुरुक्षेत्र पर युद्ध में कृष्ण अर्जुन के सारथि बने थे (आज की भाषा में Driver)। यह तो समाज की आदरणीय - पूजनीय इ. इ. श्रेणी ना आज हैं ना तब था (यद्यपि ऐसा मानना भी पाप ही है ! ) ... परंतु सारथि बनने में कृष्ण को कोई संकोच नहीं हुआ, वह तो कार्य का हेतु और कार्यपूर्ति के मार्ग (mode) मे निहित (implied) न्याय को महत्व देते हैं।
तुलना से यह उदाहरण भली भाँति समझा जा सकता हैं।
दुर्योधन ने चालाकी कर मद्र देश के राजा शल्य को अपनी ओर से युद्ध करने पर विवश किया। आगे कर्ण के आग्रह पर उन्हे कर्ण का सारथि भी बनाया। इससे शल्य अत्यत क्रोधित हुए और युद्ध में वह अपशब्द बोलकर कर्ण को हतोत्साहित (depress) करते रहे। भला कौनसा राजा किसी और योद्धा का सारथि बनना चाहेगा !

अर्थात, कृष्ण जीवन का सार हैं प्रेम, न्याय और निरंतर समाजहित हेतु कर्म ! 

हम हिंदु कितने भाग्यशाली हैं कि हमारे देवपुरुष ऐसे लोकोत्तर गुणोंवाले है !

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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