#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १६० - दि. ३१.१०.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १६०: दि. ३१.१०.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
स्वधर्म के लिए बलिदान की श्रृंखला में एक ओर प्रेरणादायी नाम है कवि कलश का !
दि.११ मार्च १६८९ में औरंगजेब ने संभाजी महाराज के साथ उनके सहयोगी - सेवक - मित्र कवि कलश की भी हत्या की थी।
कवि कलश के पूर्व आयुष्य के संबंध में और संभाजी महाराज से उनके परिचय के प्रसंग के विषय में अत्यंत कम जानकारी उपलब्ध है।
वह कनौजी ब्राह्मण थे। माना जाता हैं कि आग्रा में औरंगजेब की कैद से शिवाजी महाराज जब निकल गए तब मथुरा में रहते समय संभाजी महाराज की भेंट कवि कलश से हुई थी। यद्यपि इस संबध में निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है।
संभाजी महाराज को भाषाओं में रुचि थी। उन्हे संस्कृत, ब्रज, फारसी, अंग्रेजी आदि भाषाएं अवगत थी। उन्होने संस्कृत भाषा में 'बुधभूषण' यह संस्कृत ग्रंथ लिखा हैं। ब्रज भाषा में उन्होने 'नायिकाभेद', 'नखशिखा' व 'सातसतक' इन ग्रंथों की रचना की है।
कदाचित कवि कलश के साथ उनकी मित्रता के लिए साहित्यप्रेम यह समान धागा हो सकता है।
संभाजी महाराज के साथ औरंगजेब के सरदार मुकर्रब खान ने कवि कलश को भी कैद किया। अत्यंत अपमानित अवस्था में दोनों को औरंगजेब के सामने लाया गया।
स्वराज्य के छत्रपति को कैदी के रुप में देखकर औरंगजेब का दिल भर आया, उसकी अनेक वर्षों की इच्छा पूर्ण हो गई थी।
अल्लाह का शुक्रिया अदा करने के लिए व प्रार्थना करने के लिए वह अपने तख्त से नीचे उतर आया।
कवि कलश के मुख से तत्काल काव्यपंक्तीयाँ निकली,
'यावन रावन की सभा
संभु बंध्यो बजरंग
लहू लसत सिंदूर सम
खूब खेल्यो रनरंग
जो रबी छबी लखतही
खद्योत होत बदरंग
तो तव तेज निहारके
तखत त्यजो अवरंग'
अर्थ :
रावण की सभा में आए हनुमान के समान आज संभाजी महाराज यहाँ प्रस्तुत हैं। संपूर्ण शरीर रक्त से लाल होने के कारण वह सिंदूरधारी (हनुमान) के समान दिखाई दे रहें हैं।
जैसे सूरज के प्रकाशमान होते ही जुगनु निस्तेज होने लगते हैं, उसी प्रकार इस अवस्था में भी संभाजी महाराज का तेज सहन ना होने के कारण औरंगजेब ने अपना सिंहासन त्याग दिया है !
कवि कलश की रचना सुनकर औरंगजेब का क्रोध सीमा पार कर गया और उसके आदेश पर तत्काल कवि कलश की जिव्हा काट दी गई।
इसके बाद महाराज के साथ कवि का भी उतना ही दुखद अंत क्रूरता से किया गया।
कवि कलश के विषय में इतिहासकारों में मतभेद है। उन्हे स्वार्थी, वामाचारी व राजद्रोही भी कहा गया है।
साधारण व्यक्ति में गुण और अवगुण दोनो होते हैं। इसलिए कवि कलश के विषय में भी यह संभव है।
किंतु आज हमें केवल उनकी निष्ठा और उनकी धर्मनिष्ठा को समझने का प्रयास करना है।
धर्मांतर करने पर मुक्तता का प्रलोभन कवि कलश को भी दिया गया था। संभाजी महाराज को भी धर्मांतर के लिए तैयार करने पर और अधिक पुरस्कार का भी प्रलोभन दिया गया था।
कवि ने तत्काल स्पष्टरुप से नकार दिया!
ना वे अपने मित्र - राजा से द्रोह करना चाहते थे, ना प्राण बचाने के लिए स्वधर्म त्यागने को प्रस्तुत थे !
उल्टे उन्होने सरदारों के सामने मुगल बादशाह के उपहासपर काव्य रचना कर उसको निडरता से तीखा उत्तर दिया।
इसके पश्चात अत्यंत क्रूरता से वेदनादायी मृत्यु का भविष्य जानते थे कवि कलश ! किंतु उन्होने स्वधर्म के लिए साक्षात मृत्यु को ही अलिंगन दे दिया।
संभाजी महाराज के साथ ही भगवान श्रीकृष्ण के 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः' इस वचन का निर्वाह करनेवाले वीर कवि का नाम धर्मनिष्ठा के साथ सदैव जुडा रहेगा ।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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