#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १०४ - दि. ०५.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १०४: दि. ०५.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
श्रीकृष्ण के सत्यभामा व जांबवती के विवाह की गाथा एक दूसरे से जुडी हुई हैं।
सत्राजित मथुरा / द्वारका के गणमान्य नागरीक थे। राजकुल से उनके अच्छे संबध भी थे।
उनके पास स्यमंतक मणि नामक एक मूल्यवान रत्न था। वह उस मणि की पूजा करते थे। यह मणि अत्यंत गुणवान थी और जिसके पास हो उसे शत्रु, अराजक, विषप्रयोग आदि विविध बाधाओं से संरक्षण मिलता था। मान्यता यह भी हैं कि यह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना देती थी। हम यह भी मान सकते हैं की जिसके पास यह मणि हो उसे प्रचुर मात्रा में धन प्राप्त होता था।
एक दिन श्रीकृष्ण ने सत्राजित सुझाव दिया की वह मणि राजा को अर्पण करें। इसका उपयोग वह जनसेवा के लिए करेंगे और मणि की सुरक्षा भी हो जाएगी।
परंतु सत्राजित नहीं माने। श्रीकृष्ण ने भी आग्रह नहीं किया, उन्होने चर्चा को पूर्णविराम दिया।
कुछ दिनों बाद जब सत्राजित घर में नहीं थे तब उनके भाई प्रसेनजीत ने स्यमंतक मणि गले के हार में धारण किया और वन में आखेट (शिकार) के लिए गए। वहाँ एक सिंह ने उन्हे व उनके घोडे को मार डाला।
सत्राजित ने घर लौटने पर देखा की मणि घर में नहीं है। उन्होने श्रीकृष्ण पर इसकी चोरी का आरोप लगाया।
श्रीकृष्ण मणि खोजते - खोजते वन में पँहुचे तो वनवासियों से उन्हे प्रसेनजीत की मृत्यु का समाचार मिला।
घटनास्थल पर जाकर सिंह के पदचिन्हों के पीछे जानेपर एक स्थान पर सिंह का भी शव देखा गया। उसके पास ही कुछ अपरिचित पदचिन्ह भी थे जिसके पीछे जानेपर वह एक गुफा तक पँहुचे।
यह जांबवान् की गुफा थी। सिंह को मारनेपर उन्होने मणि उठाया और गुफा में अपने बच्चों को खिलौने के रुप मे दिया।
श्रीकृष्ण ने गुफा में प्रवेश कर उन्हे स्यमंतक मणि लौटाने का अनुरोध किया।
जांबवान् ने यह बात नहीं मानी और श्रीकृष्ण को द्वंद्वयुद्ध के लिए ललकारा।
दोनों में तुमुल युद्ध हुआ। जांबवान् शक्तिशाली भी थे और युद्धनिपुण भी ! किंतु श्रीकृष्ण को वह पराजित नहीं कर पाए।
बहुत समय के बाद जांबवान् के मन में कुछ खटका। युद्ध में भी श्रीकृष्ण की मोहिनी मुद्रा और उनका असामान्य युद्धकौशल देखकर उन्होने अंततः श्रीकृष्ण के वास्तविक रुप को पहचाना। श्रीकृष्ण को प्रणाम कर उन्होने क्षमायाचना की।
भक्तवत्सल श्रीकृष्ण ने जांबवान् को हृदय से लगाया।
जांबवान् ने अपनी कन्या जांबवती का पाणिग्रहण करने का अनुरोध अपने प्रभु से किया और श्रीकृष्ण ने सहमति दी।
इधर बारह दिनों तक श्रीकृष्ण का समाचार ना मिलने पर यादव चिंतित हुए। बहुत ढूंढनेपर भी उनके संबध में कोई सूचना नहीं मिल पाई। अतः श्रीकृष्ण का अंत हुआ मानकर वह शोकमग्न हुए।
परंतु श्रीकृष्ण नवविवाहित पली जांबवती के साथ लौट आए। उन्होने जांबवान द्वारा उन्हे अर्पण किया गया स्यमंतक मणि सत्राजित को वापस दिया। सत्राजित लज्जित थे, उन्होने श्रीकृष्ण पर लगाए गए चोरी के लांछन के प्रायश्चित्त के रूप में अपनी कन्या सत्यभामा का पाणिग्रहण करने का अनुरोध श्रीकृष्ण से किया।
विवाह में यौतुक (dowry) के रुप में सत्राजित ने स्यमंतक मणि श्रीकृष्ण को अर्पण किया। किंतु श्रीकृष्ण को उसका मोह कभी था ही नहीं इसलिए उन्होंने सत्राजित से कहा कि भगवान सूर्यदेव ने आपको यह मणि प्रदान की हैं इसलिए इसे वह अपने पास ही रखे।
उपर उल्लिखित गाथा में श्रीकृष्ण का जनसेवा के लिए प्रेरित दृष्टीकोण, उनकी युद्धनिपुणता और संपत्ति का मोह ना रखनेवाली निर्मोही वृत्ती का मनोज्ञ दर्शन होता है !
वैसे श्रीकृष्ण के आठों विवाहों की गाथा के पश्चात हम उनके विवाहों के संदर्भ में एक बहुत ही रोचक और विचारणीय बात देखेंगे जो वास्तविक जीवन में हमें मन से श्रीकृष्ण के पास ले जाने में सहायक होगी।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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