#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १३३ - दि. ०४.१०.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १३३: दि. ०४.१०.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
धर्म पर श्रद्धा मनुष्य को कितनी उँचाइयों तक ले जाती हैं इसका उदाहरण पाण्डवों के जीवन से देखा जा सकता हैं।
पाण्डवों में ज्येष्ठ हैं युधिष्ठिर। इसलिए बाकी चारो पाण्डव उनके अधीन थे।
कुटुंब के ज्येष्ठ पुत्र को संपूर्ण अधिकार देकर अन्य सभी सदस्यों ने उसके अधीन जीवनयापन करना यह भारत में सामान्य पद्धति रहीं हैं। परंतु यह सामान्य स्थिति में मानना और बात हैं और पाण्डवों जैसी असाधारण स्थिति में भी इसी नियम पर टिके रहना और बात हैं। वह भी तब, जब अन्य पाण्डव पूर्ण रुप से समर्थ से और युधिष्ठिर की छत्रछाया के बिना भी उनका भविष्य हो सकता था।
पाण्डवों में अर्जुन, नकुल व सहदेव यद्यपि पराक्रमी थे परंतु वृत्ति से वह संयमित और आज्ञाकारी थे।
भीम का स्वभाव थोडा भिन्न था। उनमें तेज और उग्रता कुछ अधिक मात्रा में थी। वह जल्दी क्रोधित होते थे। और वह शारिरिक रुप से अत्यंत बलिष्ठ थे, इसलिए उनके क्रोध के परिणाम अनिष्टकारी होने की संभावनाएं थी।
किंतु कदाचित यह उन के स्वभाव का भोलापन हो अथवा पाण्डवों में सदैव एकजुट रखने की माता की सीख हो अथवा अपने प्रचंड स्वभाव के उपरांत भी उन्होने अपनी मर्यादा रेखांकित कर ली हो, भीम का क्रोध भी कल्याणकारी ही रहा था।
दुर्योधन ने प्रमाणकोटी में क्रीडा का कारण बताकर पाण्डवों को आमंत्रित किया और भीम को अपने भविष्य का शत्रु मानकर उनपर विषप्रयोग कर पानी में बहा दिया। विष उतारने की उचित औषधी समय से मिलनेपर उनके जीवन की रक्षा हो पायी थी।
किंतु भीम जैसे उग्रप्रकृति वीर के लिए दुर्योधन को उसके इस कृत्य का दण्ड ना देना अकल्पनीय हैं। तब उनकी किशोरावस्था ही थी।
परंतु माता और ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर की आज्ञा मानकर उन्होने इतनी छोटी आयु में संयम की इतनी कठोर परिक्षा दी थी।
द्रौपदी वस्त्रहरण के प्रसंग में वह क्रोध से उबल रहे थे, परंतु ज्येष्ठ भ्राता का सम्मान कर उन्होने पाण्डवों की एकता को कायम रखा यद्यपि दुर्योधन और दुःशासन को दण्ड देने की भीषण प्रतिज्ञा उन्होने वहाँ की थी और युद्ध में उसे पूर्ण भी किया।
किंतु उस समय की आवश्यकता संयम की थी और भीम ने अपने क्रोध पर नियंत्रण रखकर धर्मपालन के मापदण्ड को पूर्ण किया।
वनवासकाल में जयद्रथ ने द्रौपदी का अपहरण किया तब पाण्डवों ने उसका पीछा कर द्रौपदी को मुक्त किया। यह अक्षम्य अपराध था किंतु जयद्रथ पाण्डवों का बहनोई था - धृतराष्ट्र की कन्या दुःशला का पति - इसलिए धर्मराज ने उसे कठोर दण्ड नहीं दिया, अपमान स्वरूप उसका केशमुण्डन कर छोड दिया।
इस प्रसंग में भी भीमसेन अति उग्र हो उठे थे किंतु उन्होने ज्येष्ठ भ्राता की आज्ञा का पालन किया।
उल्लेखनीय है कि द्रौपदी संबधित दोनो प्रसंगों में माता कुंती उनके साथ नहीं थी, फिरभी भीम ने अपनी मर्यादा की रक्षा की।
संस्कार ऐसे ही होते हैं !
माता - पिता, ज्येष्ठ परिजन कुछ समय तक उँगली पकड़कर मार्गदर्शन करते हैं। उसके पश्चात मनुष्य को अपने विवेक से अपने कर्म को उँचाइयों तक ले जाना होता हैं।
पाण्डवों की इसी सहनशीलता और धर्मप्रण वृत्ति के कारण भगवान श्रीकृष्ण उनके जीवन का अभिन्न भाग बन उनकी रक्षा करते रहे 🙏🏼
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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