#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १३७ - दि. ०८.१०.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
 भाग १३७: दि. ०८.१०.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
 
सनातन हिंदु धर्म के अनुसार मनुष्य का शरीर मात्र उसका  अस्तित्व नहीं हैं। ऐसा इसलिए हैं हमारी आत्मा पंचकोशो से वेष्टित (covered) हैं। सबसे बाहरी आवरण अन्नमय कोश और इसके भीतर प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश होता हैं।
 
हमारा शरीर हमारी आत्मा का सबसे बाहरी आवरण (कोश) हैं। यह दृश्यमान है अर्थात इसे आँखों से देखा जा सकता है। इसे स्थूल अस्तित्व भी कहा जाता हैं। 
अन्य चार कोश दृश्यमान नहीं हैं अर्थात शरीर की आँखों से उन्हे देखा नहीं जा सकता हैं ।

बाहरी आवरण अर्थात अन्नमय कोश केवल तात्कालिक और बहुत छोटी अवधी के लिए होता हैं और यह सर्वाधिक शक्तिहीन (Vulnerable/ weak) होता हैं। इसिलिए वह पूर्णतः नष्ट भी हो जाता हैं और उसे स्वाभाविक रुप से बचाकर रखने का अथवा अमर बनाने का कोई मार्ग नहीं होता हें।

हम इसे एक रुपक की दृष्टी से भी देख सकते हैं। अर्थात जो दृश्य हैं वह तात्कालिक हैं, कम अवधी के लिए है, नष्ट होनेवाला है और पुनः उस रुप में प्राप्त होना असंभव हैं यह यदि हम समझ ले तो हमारे जीवन की अनेक चिंताएँ और दुख दूर हो सकते है। 

जैसे कई बार हम अपनी तुलना दूसरों से करते हैं। हमें लगता हैं की वह हमसे अधिक भाग्यशाली है। उनके पास बडा घर, गाडियाँ, महंगे वस्त्र, आभूषण, सुंदर फर्निचर हैं, घर में मदत के लिए नौकर हैं आदि।

किंतु यह सब उपरी / दृश्य सुख हैं। इसे पाने के मार्ग नैतिक हो सकते हैं और अनैतिक भी। और मार्ग जैसे भी हो किंतु यह सब नष्ट होने की संभावना भी होती है। यदि नष्ट ना भी हो तब भी इन भौतिक वस्तुओं की उपलब्धता मनुष्य को सुखी होने का आश्वासन नहीं देती हैं। क्योंकि सुख और दुख यह मन की अवस्था हैं इसलिए शरीर को मिल सकनेवाली सुखसुविधाएँ मनुष्यजीवन के सुखों का प्रमाण नहीं है।

इसलिए मनुष्य को बाहरी आवरण अर्थात संपत्ति और सुख साधनों की चकाचौंध से भ्रमित नहीं होना चाहिए अपितु अदृश्य परंतु अधिक स्थायी आवरणों को पुष्ट करने के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए ।

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩 
भारतमाता की जय 🇮🇳

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