#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १५८ - दि.२९.१०.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १५८: दि. २९.१०.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩 

सनातनी हिंदु धर्मियों के लिए विश्व में अब एक ही राष्ट्र हैं, भारत !
(वैसे नेपाल भी हिंदु राष्ट्र हैं किंतु विश्व के सब हिंदु इसे अपना घर बनाए ऐसी स्थिति नहीं हैं।)

हम सनातनी हिंदुओं का घर हैं भारत, किंतु परकी आक्रमकों ने यहाँ आकर हमें अपने धर्म से दूर करने के लिए हरसंभव प्रयास किया।

सबसे भयानक मार्ग आतंक का था। यद्यपि इस कारण अनेकों ने धर्मांतर किया भी, परंतु अनेक तेजस्वी व्यक्तित्व ऐसे थे जिन्होने स्वधर्म के प्रति अपार आस्था के उदाहरण सामने रखे हैं। ऐसे उदाहरण, जो अनेक शतकों के पश्चात भी सनातनी हिंदुओं में श्रद्धा और निष्ठा की ज्योत जगा रहें हैं।

यद्यपि अंत में शत्रुओं ने उनकी हत्या की थी, किंतु उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया हैं। मृत्यु तो जीवन का अंतिम सत्य है और सबको इस सत्य की भेंट चढना ही है। परंतु यह वे वीर थे जो देह की मृत्यु के पश्चात भी अमर हुए हैं।

यदि हर कोई शरणागति के मार्ग से जाता तो अगली पिढियों के लिए भी यही सीख रहती की स्वधर्म का मूल्य दमन और अत्याचारों के भय से उसे त्यागने जितना ही हैं !

परंतु जिन्होने अपने प्राण स्वधर्म पर न्योछावर किए उनके कारण आज भी सनातनी हिंदुओं में धर्मनिष्ठा की ज्योत दीप्तिमान हैं !

हम ऐसे वीरों की श्रृंखला में पहला नमन गुरु गोविंदसिंहजी और उनके कुटुंब का करेंगे 🙏🏼।

सिखों के दसवें गुरु गोविंदसिंहजी और उनके चारो पुत्रों ने धर्मरक्षा व धर्मनिष्ठा के लिए प्राणों की आहुति दी थी।

अपने दो ज्येष्ठ पुत्र अजित सिंह और जुझार सिंह को गुरुजी ने ही युद्ध पर भेजा था, आयु १७ और १३ वर्ष। उन्हे युद्ध में वीरगति प्राप्त हुई। इन्हे हम अभिमन्यु के अवतार कह सकते हैं। 
छोटे दो पुत्र जोरावर सिंह और फतेह सिंह अपनी दादी के साथ थे। युद्ध की आपाधापी में यह तीनो गुरुजी से बिछुड गए थे।
उनके रसोइये गंगू ने पैसों की लालच में उनका ठौरठिकाना मुगल सरदार वजिर खान को बताया। उसने तीनों को कैद कर लिया। गुरुजी के दोनो पुत्रों को धर्मांतर करने पर जिवित रखकर स्वतंत्र करने का प्रलोभन दिखाया गया, किंतु दोनों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। 
इसका परिणाम वह जानते थे, मृत्यु ! 
परंतु वह अपने निर्णय पर कायम थे। 
वजिर खान ने अत्यंत क्रूरता से इन बच्चों को जिवित रहते ही दिवार में चिनवा कर मार दिया था।
इन वीर सुपुत्रों की आयु थी केवल ९ वर्ष और ७ वर्ष। बताया जाता हैं कि गुरुजी की माताजी अर्थात माता गुजरीजी कैद में तीन दिनों तक दोनो बच्चों को स्वधर्म पर प्राण न्योछावर करने का उपदेश देती रही थी। बच्चों ने दादी माँ के उपदेश का और अपने कुटुंब की परंपरा का मान रखा। 'जो बोले सो निहाल, सत् श्री अकाल' कहते हुए उन्होने मृत्यु को गले लगाकर वीरता और धर्मनिष्ठा का बेजोड उदाहरण प्रस्तुत किया।

आक्रमकों ने गुरु गोविंद सिंहजी की भी हत्या करवा दी।

सिख गुरुजी के कुटुंब के बलिदान का ऋण सनातनी हिंदु धर्म पर भी है।
परकियों ने इस देश पर किए आक्रमणों को अपनी छाती पर झेलकर उन्होने स्वधर्म पर निष्ठा के जो उदाहरण प्रस्तुत किए उसने उस अंधेर युग में हिंदुओं में भी चेतना का संचार किया था।

गुरुजी व उनके कुटुंब को शतशः नमन 🙏🏼। 

गर्व से कहे 👇🏼 
हिंदु धर्म की जय 🚩 
भारतमाता की जय 🇮🇳

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