#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ९९- दि. ३१.०८.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ९९ : दि. ३१.०८.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

श्रीकृष्ण की अनेक विशेषताएँ हमने देखी हैं। उनके विचारों की, तत्वज्ञान की, उपदेश की ही चर्चा होती हैं। परंतु योद्धा कृष्ण, मल्ल कृष्ण, युद्धनीतिकुशल कृष्ण यह पहलु दुर्लक्षित ही रहे हैं।

इसमें से मल्ल कृष्ण का रुप हमने कंस के वध के प्रसंग में देखा हैं। इस समय कृष्ण किशोर वय में थे। तो हम यह कल्पना कर सकते हैं कि आगे उनके कौशल का कितना विकास हुआ होगा !

'योद्धा कृष्ण' इस विषय पर तो कदाचित हमने कभी सोचा ही नहीं हैं। उन्हे हम 'देव' के रुप में देखते हैं, पूजते है, बालकृष्ण की लीलाओं का रसभरा वर्णन करते - सुनते - पढते हैं, उनके बाँसुरी वादन के असाधारण कौशल्य का, उनके मनमोहन रुप और मनभावन हास्य का, उनके वाक्पटुता का वर्णन करते हैं, किंतु वह वीर योद्धा थे यह हम कभी देखते ही नहीं हैं ! 

हिंदुओं के देवी - देवता और उनके अवतार शस्त्रसज्ज होते हैं, वह स्वयं वीर होते हैं, वह युद्ध और युद्धनीति प्रवीण (expert) होते हैं और आवश्यकता के अनुसार उन्होने अत्याचारी, क्रूर मनुष्य और असुरों का वध भी किया हैं यह गौरव की बात हैं।
आतंक के सामने घुटने टेकना, अहिंसा की माला जपना और असहाय्यता से अत्याचार सहना ऐसा उपदेश हमारे सनातन हिंदु धर्म में कभी भी नहीं दिया गया हैं।

कृष्ण भी पराक्रमी योद्धा थे। 
जरासंध के साथ उनके १७ युद्धों का इतिहास अत्यंत रोचक हैं। 
कंस के वध से जरासंध अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने कृष्ण को मार डालने का निश्चय कर मथुरा पर आक्रमण किया। वैभवशाली मगध राज्य की प्रचंड सेना लेकर वह आया था। 
किंतु इस युद्ध में जरासंध पराजित हुआ। उसकी सारी सेना का नाश हुआ किंतु कृष्ण ने जरासंध को जिवित छोड दिया।
अपमानित जरासंध अपने राज्य में लौट गया। किंतु कृष्ण से बदला लेने का हेतु लेकर उसने समविचारी राजाओं को एकत्र किया और पुनः आक्रमण किया।
युद्ध में श्रीकृष्ण ने संपूर्ण सेना व अन्य सभी राजाओं को मार दिया परंतु जरासंध को जिवित छोड दिया। पराजित जरासंध मगध देश लौट गया, पुनः उसने अपने मित्र राजाओं के साथ मिलकर आक्रमण किया। पुनः वही सब हुआ और जरासंध अकेला अपने राज्य में लौट गया।
ऐसे युद्ध कुल १७ बार हुए। 

बलराम ने कृष्ण से पूछा, "प्रत्येक समय ऐसा क्यों करते हो ? जरासंध को क्यों नहीं मार देते ? यह बार बार आक्रमण कर रहा हैं .. "

कृष्ण ने कहा, "इससे हमारी सहायता ही हो रही है। वह प्रत्येक आक्रमण के समय नए नए दुष्ट राजाओं को लेकर आ जाता है, हमें इतने सारे अत्याचारी एकसाथ ही मिल जाते हैं। उन्हे ढूँढ ढूँढ कर मारने के कष्ट नहीं करने पडते हैं।"

ऐसे अनेकों राजाओं के नाश के बाद कृष्ण ने मथुरा से स्थानांतरण के लिए सोचा। क्योंकि युद्ध में मथुरा प्रजाजनों को असुविधा और कष्ट हो रहा था। इसलिए उन्होने द्वारका नगरी का निर्माण किया और सभी नागरिकों को वहाँ भेज दिया। मथुरा नगरी में किसी को भी ना पाकर जरासंध क्रोधित हुआ।
परंतु श्रीकृष्ण ने अभी भी जरासंध का वध नहीं किया। इसके लिए उन्होने दूसरी योजना बना रखी थी।

श्रीकृष्ण के युद्धकौशल के दर्शन हम विविध अंगों से करेंगे🙏🏼

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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