#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १२४- दि. २५.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १२४: दि. २५.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
संस्कार मनुष्य का व्यक्तित्व बनाते हैं।
परंतु संस्कार को स्वीकार करने की मनोभूमिका यह उसकी पहली शर्त है !
जैसे लुटेरा वाल्या ऋषि वाल्मिकी बना और तामसी - क्षत्रिय गुणों से युक्त राजा कौशिक ब्रह्मर्षी विश्वामित्र बने !
हम सब देखते हैं की वर्षाऋतु प्रारंभ होते ही जमीन से विविध प्रकार की घास उगने लगती है और अन्य भी कई प्रकार के छोटे बडे पौधे अचानक ही लहलहाने लगते हैं। क्योंकि उनके बीज मिट्टी में थे, दबे हुए थे, किंतु थे तो ! वातावरण की अनुकूलता मिलते ही वह अपना रुप धारण करते हैं।
ऋषि वाल्मिकी व विश्वामित्र के साथ क्या यही नहीं हुआ था ?
हमारे लिए यह एक सीख हैं क्योंकि हमें यह सुनिश्चित करना होगा की हमारे मन की मिट्टी इतनी उपजाऊ होनी चाहिए की जिसमें संस्कारों के बीज पड जाए तो उनसे अंकुर आने चाहिए।
इसे भी हम श्रीकृष्ण के संदर्भ में देख सकते हैं।
श्रीकृष्ण पाण्डवों के हितैषी, मार्गदर्शक तथा संरक्षक थे। यह तो स्पष्ट ही हैं कि पाण्डवों की धर्मनिष्ठा व भौतिक जीवन के सुखपभोगों के प्रति अनासक्ती के कारण श्रीकृष्ण द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलना उनके लिए संभव हो पाया।
परंतु ऐसी मनोभूमिकावाले पाण्डव अकेले तो नहीं थे !
पितामह भीष्म का त्याग कितना महान है। संपन्न कुरू वंश के समर्थ युवराज होने पर भी उन्होने विवाहयोग्य आयु में ब्रह्मचर्य का प्रण किया और आजीवन उसे निभाया। वैभवशाली कुरु साम्राज्य के सिंहासन का त्याग उन्होने सहजता से कर दिया।
वह सारे दायित्व निभाते रहें परंतु सर्वथा आसक्तीहीन थे। संक्षेप में यह कहा जा सकता हैं की राजमहल में निवास, राजसी वस्त्रप्रावरण व अन्य सुविधाओं का उपयोग करने पर भी वह वास्तव में संन्यस्त जीवन जी रहे थे।
ऐसी ही दूसरी व्यक्ति हैं कृपाचार्य।
बाल्यावस्था से ही कृप और कृपी का पालनपोषण राजा शान्तनु (पितामह भीष्म जिनका मूल नाम देवव्रत था) ने किया था। कृपी का विवाह आचार्य द्रोण से हुआ जिनकी सन्तान हैं अश्वत्थामा।
परंतु कृपाचार्य आजन्म अविवाहित रहे। भोगविलास में उनकी रुचि नहीं थी। सत्ता की आकांक्षा अथवा पद का मोह उन्हे नहीं था इसलिए वह आचार्य द्रोण के साथ पाठशाला में विद्यादान करते थे, किंतु द्रोण के कुलपति होनेपर उन्हे कभी आपत्ति नहीं रही।
कह सकते हैं कि अत्यंत सद्वर्तनी, मन से निर्लोभी - सन्यस्त वृत्ती के दो उदाहरण महाभारत में है परंतु उनका पथप्रदर्शक बनने की पहल श्रीकृष्ण नें कभी नहीं की है। और पाण्डवों के समूचे जीवनपट पर श्रीकृष्ण का कृपाछत्र विराजमान हैं।
हम इनके कारण समझने के प्रयत्न करेंगे क्योंकि प्रभु की कृपादृष्टी से कल्याण - मोक्षप्राप्ति की कामना हम भी रखते हैं।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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