#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १४१- दि. १२.१०.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १४१: दि. १२.१०.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
अनेकों बार हमने हवा से विभूति, मिठाई अथवा अन्य कुछ पदार्थ उत्पन्न करनेवाले व्यक्तियों के संबध में सुनते है। एक ही व्यक्ती की एक समय में अनेक स्थानों पर उपस्थिति संबधी भी अनेकों के अनुभव है। इच्छा होनेपर अन्न, जल अथवा तत्सम वस्तु उपलब्ध कराना, दूसरों के मन की भावनाएँ जानना, भविष्य की घटनाओं की पूर्वसूचना देना, व्याधिमुक्त करना, मृत व्यक्ती को पुनः जिवित करना आदि के संबध में भी बहुत कुछ कहा - सुना - लिखा गया है।
क्या यह संभव है ?
है !
किंतु यह ऐसा ज्ञान, ऐसी शक्ती है जिसका उपयोग केवल असाधारण स्थिति में और अत्यावश्यक होने पर ही करना चाहिए ऐसा इस मार्ग के अधिकारी व्यक्तियों द्वारा पुनःपुनः बताया जाता है।
साधना के विशिष्ट पडाव पार करने पर यह सिद्धियाँ प्राप्त होती है। किंतु इन सिध्दियों का मोह रखना अथवा अपना महत्व बढाने के लिए, प्रसिद्धि - संपत्ति प्राप्त करने के लिए अथवा अन्य किसी भी स्वार्थमूलक हेतु से इनका प्रयोग करने से साधना मार्ग में अधोगति होती है जैसा साँपसिढी के खेल में होता है।
अनेक संतों के चरित्र में इसके संबंध में सावधानता की सूचना पायी जाती है। जैसे परमहंस योगानंद इनके 'Autobiography of a Yogi' में इसका उदाहरण दिया गया है।
वस्तुतः गुरुकृपा होने पर और गुरु के मार्गदर्शन में साधना में प्रगति होनेपर सिध्दियों का पडाव आता हैं (अष्टसिद्धि )।
यह आठ सिद्धियाँ हैं अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, इश्त्व, वशित्व।
अणिमा - शरीर का आकार सूक्ष्म करने की क्षमता (हनुमानजी द्वारा लंका अवलोकन जिससे राक्षस उन्हे देख नहीं पाए )
महिमा - शरीर का आकार असाधारण रुप से बडा करने की क्षमता (श्रीकृष्ण द्वारा विश्वरूप दर्शन)
गरीमा - शरीर को अत्यंत भारी बनाने की क्षमता (हनुमानजी द्वारा भीम के गर्वहरण का प्रसंग)
लघिमा - शरीर को एकदम भाररहित बनाने की क्षमता (आकाशमार्ग से लंका जाने के लिए कदाचित हनुमानजी ने इस शक्ती का उपयोग किया हो सकता है )
प्राप्ति - किसी भी स्थान पर जाने की क्षमता (हनुमानजी द्वारा संजीवनी बूटी के लिए लंका से द्रोणागिरी पर्वत लाने की यात्रा)
प्राकाम्य - प्रत्येक इच्छा पूर्ण करने की क्षमता
इश्त्व - प्रत्येक मनुष्य और प्राणी पर पूर्ण अधिकार स्थापित करने की क्षमता
उपर उल्लिखित दोनो सिध्दियों के उदाहरण अनेक संत चरित्रों में पाए जाते हैं।
वशित्व - प्रत्येक प्राणी को वश में करने की क्षमता (श्रीकृष्ण द्वारा बाँसुरी वादन से वन्य पशु पक्षियों को प्रेम से मोहित करने के प्रसंग)
स्पष्ट है कि यह अत्यंत लुभावनी सिद्धियाँ हैं जिनका उपयोग अथवा प्रदर्शन करने का मोह सँवारना कठिन है। इसमें पुनः गुरु का महत्व अधोरेखित होता है।
जिस साधक ने सिद्धियों को ही साध्य (objective) मानकर गुरुआज्ञा का उल्लंघन किया अथवा गुरु के प्रेमपूर्ण आवरण से बाहर जाने का निर्णय लिया उसकी साधना में अधोगति निश्चित है !
साधनामार्ग पर चलनेवालों के संबध में यह सत्य है। किंतु उपरोल्लिखित विषय से हम सामान्य जन क्या बोध ले सकते हैं इसपर हम विचार करते रहेंगे।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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