#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ८८ - दि. २०.०८.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ८८ : दि. २०.०८.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
गोकुल में कृष्ण की बाललीलाओं का मनोरम वर्णन साहित्य में अनेक प्रकार से किया गया है।
अपने बालमित्रों को साथ लेकर गोपियों के घर से दही - मख्खन चुराकर खाना इनमें से अत्यंत लोकप्रिय आख्यान है।
परंतु यह ध्यान रखना आवश्यक हैं कि हम हजारो वर्ष पूर्व की स्थिति का विचार रहे है। उस काल में बच्चों का पडोसियों के घर आना-जाना , खेलना- खाना, अडोसपडोस की मौसियों से बालहठ करना सहज स्वाभाविक था। आज से ७०-८० वर्ष पूर्व तक भारत में यह सब सामान्य माना जाता था, तो उस युग में भी यही रीत होगी।
तब कृष्ण में ऐसा क्या विशेष हैं की उसके बचपन की नटखट लीलाओं को इतना भव्य-दिव्य स्वरूप दिया गया है ?
कृष्ण की विशेषता यह थी की बचपन से ही वे मित्रों की टोली में रहते थे। अपने संगी-साथियों को लेकर, उनके साथ उनमें बाँटकर दही-मख्खन खाना यह उन्हे मित्रता के अटूट बंधन में बांधने का कृष्ण का मार्ग था।
क्योंकि कृष्ण समाज को जोडने के लिए मानवरुप में अवतरित हुए थे। अमंगल का नाश तो ईश्वर के अवतार को करना ही था परंतु उसके पश्चात सुमंगल की स्थापना, न्यायपूर्ण और विश्वास पर आधारित समाज की रचना इसके लिए आपसी प्रेम और एकजुट आवश्यक हैं और कृष्ण गोकुल की उस पिढी को 'कृष्णप्रेम' के रज्जु (cord) से एकसाथ बांध रहे थे।
उस आयु में कृष्ण की क्रीडाओं का जो वर्णन है उस प्रत्येक क्रीडा में यही विशेषता पाई जाती है।
कृष्ण अपने बाल गो - पालक साथियों के साथ गायों को चराने वन में ले जाते थे। गोकुल के मुखिया का पुत्र होने पर भी उन्हे इससे छूट नहीं थी। साधारण गो - पालक बालको जैसे ही वह वन में जाते थे। उनके संगी-साथी भिन्न भिन्न स्वभाव के होंगे, उनका रंग-रुप भिन्न होगा, कोई अति सुंदर तो कोई साधारण होगा, कोई अत्यंत बुद्धीमान तो कोई सामान्य बुद्धी का होगा, संभवतः कुछ बालक धनी ग्वालों के होंगे तो कुछ गरीब ग्वालों के भी होंगे।
परंतु कृष्ण ने प्रत्येक मित्र से प्रेम किया।
भोजन के लिए सब एक साथ ही बैठेंगे और मिल बाँट कर एक दूसरे को देकर, दूसरे से ग्रहण कर खाएंगे यह व्यवस्था कृष्ण की बनाई हुई है। इससे आपसी भेद नष्ट होकर 'एकत्व' की भावना निर्माण होती हैं !
कृष्ण खेलेंगे तो सबके साथ और बाँसुरी बजाएंगे तो सबके मध्य बैठकर !
ऐसे आनंदानुभव के कारण बाल्यावस्था से ही भेदभाव मन में प्रवेश नहीं कर पाता यह सीख कृष्ण ने अपने वर्तन से दी हैं।
ईश्वर के अवतारों की गाथा ना तो काल्पनिक हैं ना ही पुराणों की अविश्वसनीय कथाएँ !
ईश्वर जब मानवरूप में अवतरित होते है तब अपने वर्तन से वह आदर्श चरित्र की व्याख्या करते हैं व आदर्श समाजनिर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
हमें आवश्यकता हैं हमारे सनातन हिंदु धर्म के महापुरुषों के चरित्र के प्रत्येक पहलु पर मनन करने की !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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