#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ९५- दि. २७.०८.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ९५ : दि. २७ .०८.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

श्रीकृष्ण का जीवन अपनेआप में परिपूर्ण हैं। परंतु पांडवों की गाथा कृष्ण के संदर्भ के बिना नहीं हो सकती हैं।
पांडव स्वयं धर्मनिष्ठ थे, न्यायी, सत्शील और नीतिमान थे, परंतु श्रीकृष्ण का सहवास और उनके उपदेश से पांडवों का चरित्र अग्नि में तपे हुए सुवर्ण जैसा निखर आया हैं।

पांडव राजकुल से थे और क्षत्रियोचित शौर्य, औदार्य आदि गुणों से संपन्न थे, परंतु जीवन के भोगों के प्रति क्षत्रियों में सामान्यत: पाया जानेवाला आकर्षण उनमें नहीं था। उनकी वृत्ती में वैराग्य भावना का प्रभाव अधिक मात्रा में देखा जा सकता हैं। इसमें पांडवों की मूल प्रवृत्ति व स्वभाव, माता कुंती के संस्कार आदि कारण तो हैं ही, साथ ही श्रीकृष्ण के सहवास का प्रभाव भी हैं।

पांडवों के कष्ट, प्रयत्न और शौर्य के कारण इंद्रप्रस्थ का राज्य वैभवशाली बन गया था। 
पांडवों की श्रीकृष्ण के प्रति भावना आदर, श्रद्धा और भक्ति की थी।  वह एक संकेत भी करते तो पांडव अपना राज्य श्रीकृष्ण को अर्पण कर देते। परंतु कृष्ण ने उनसे ऐसा कुछ भी नहीं माँगा हैं।
कृष्ण ने पांडवों को सदैव कर्तव्य और धर्मपालन को मुख्य स्थान देने का उपदेश दिया था। उन्होने अपने वर्तन से वैसा उदाहरण सामने रखा था, यद्यपि कर्तव्यपालन और धर्मपरायणता से थोडा भी अगर हटते तो पांडव और साथ ही कृष्ण को भी अथाह संपत्ती और सत्ता का लाभ हो सकता था।

इस संबध में कृष्ण का मार्गदर्शन व उपदेश का प्रमुख उदाहरण हैं कुरुक्षेत्र पर युद्ध से पूर्व कृष्णशिष्टाई !

दुर्योधन ने हस्तिनापुर राज्य पर पूर्णतः कब्जा कर लिया था। पांडवों द्वारा उत्कर्ष किया गया इंद्रप्रस्थ का राज्य भी उसने हडप लिया था। अपने ही राज्य से निष्कासित पांडवों के लिए अब युद्ध करना यही एक उपाय रह गया था और वह इसके लिए मानसिक रूप से तैयार भी थे।

पांडव ऐसे युद्ध में अवश्य विजय ही पाएंगे यह श्रीकृष्ण जानते थे। इसके पश्चात हस्तिनापुर पर पांडवों का राज्य होता। 
अबतक कृष्ण का पांडवों पर प्रभाव इतना अधिक हो गया था कि उनके एक संकेत मात्र से हस्तिनापुर पूर्णतः कृष्ण के स्वामित्व में होता।

परंतु श्रीकृष्ण सदाचार और शांति का उदाहरण रखनेवाले है, लोभ का नहीं ! 
इसलिए उन्होने पांडवों से कहा की वह स्वयं दुर्योधन के सम्मुख संधी का प्रस्ताव रखेंगे। 

वह हस्तिनापुर गए और उन्होने पांडवों को राज्य के रुप में मात्र पाँच गाँव देने का अनुरोध किया। दुर्योधन ने वह प्रस्ताव भी ठुकरा दिया, यह कहकर की सुई की नोक पर रह पाएगी इतनी भूमि भी वह नहीं देगा।
 
आगे कुरुक्षेत्र पर युद्ध में पांडवों के विजय के विषय में हम सब जानते हैं।
तात्पर्य यह हैं की कृष्ण ने स्वयं के लिए कोई मोह नहीं पाला था, वह जनमानस के सामने एक अच्छा उदाहरण रखना चाहते थे। ऐसा उदाहरण जहाँ अपने वैभवशाली इंद्रप्रस्थ राज्य के बदले पांडव मात्र पाँच गाँवों में ही संतोष करने हेतु प्रस्तुत थे। 

श्रीकृष्ण ने स्वयं के जीवन में तो ऐसे महान उदाहरण हमारे सामने रखे ही हैं, अब पांडवों के इस आख्यान से हम समझ पाते हैं कि जो कृष्ण की शरण लेते हैं उनका व्यक्तित्व भी सद्गुणों की प्रभा से कैसे उज्वल होता है🙏🏼

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २१३

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २४८

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २०२