#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १४९ - दि. २०.१०.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार 
भाग १४९: दि. २०.१०.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩 

सनातन हिंदु धर्म में बताए गए  चार आश्रमों के विवरण से स्पष्ट हैं की एक आश्रम से दूसरे आश्रम में जाने की प्रक्रिया बताई गई है। अर्थात प्रकृति के स्वाभाविक नियम, मनुष्य स्वभाव व वृत्ति आदि के नैसर्गिक प्रवाह का विचार कर इन आश्रमों की व्यवस्था की गई है। एकदम वानप्रस्थाश्रम अथवा संन्यासाश्रम की कल्पना नहीं बताई गई है (Level jumping is not expected)। 

महत्वपूर्ण तथ्य यह हैं कि हमारे ऋषि - मुनि भी गृहस्थाश्रमी थे।
ज्ञानार्जन और ज्ञानदान उनका धर्म अवश्य था किंतु सनातन हिंदु धर्म प्रजोत्पादन / संतानोत्पत्ति को भी धर्म मानता हैं जिसका उन्होने पूर्ण निर्वाह किया। हमारे धर्म में वैराग्य थोपा नहीं जाता है, सुखोपभोग से तृप्ति के पश्चात वैराग्य प्राप्ति को सम्मान दिया जाता है। जैसे महर्षि याज्ञवल्क्य ने दो विवाह और पुत्रजन्म के बाद संन्यास लिया था। इसमें उनकी ज्येष्ठ पत्नी ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी ने भी उनका अनुकरण किया था। 

बौद्ध व जैन पंथों में प्रथम दो आश्रमों को अत्यावश्यक नहीं माना जाता हैं। अल्पवयीन व्यक्तियों को भी संन्यास लेने की अनुमति है।
यह प्रथा चर्चा का विषय बनी हुई है। 
यद्यपि दूसरे धर्म, पंथ इनकी प्रथा - परंपराओं के संबध में अनुदार वचनों का उच्चार करना अथवा उनकी आलोचना करना उचित नहीं है, किंतु हमारी धर्म परंपराओं का औचित्य समझने के लिए हम उनपर विचार कर सकते है।

ब्रह्मचर्याश्रम से सीधे संन्यासाश्रम का पर्याय असाधारण व्यक्तियों के लिए और अपवादस्वरूप हैं, जैसे आदि शंकराचार्य थे। महाराष्ट्र में भी संत ज्ञानेश्वर और उनके ज्येष्ठ बंधु और गुरु निवृत्तिनाथ महाराज व कनिष्ठ भ्राता - भगिनी सोपानदेव व मुक्ताबाई आजीवन संन्यस्त जीवन जीते रहे हैं। किंतु संत ज्ञानेश्वर वे महापुरुष है जिन्होने सोलह वर्ष की आयु में भगवद्गीता पर भाष्य लिखा था 'भावार्थ दिपिका' अर्थात ज्ञानेश्वरी और इक्कीस वर्ष में उन्होने संजीवन समाधि ली थी।
अर्थात, यह अपवाद हैं, नियम नहीं हैं। साधारण व्यक्ति को इन महान व्यक्तियों की नकल नहीं करनी चाहिए❗

हम इस विषय को उदाहरणों से और भगवद्गीता के उपदेश के आलोक में समझने का प्रयत्न करेंगे 🙏🏼

गर्व से कहे 👇🏼 
हिंदु धर्म की जय 🚩 
भारतमाता की जय 🇮🇳

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