#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १०३ - दि. ०४.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १०३: दि. ०४.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
श्रीकृष्ण की अष्टभार्याओं की गाथा रोचक हैं क्योंकि इन आठों पत्नियों के साथ विवाह के प्रसंग भी श्रीकृष्ण के गुणदर्शन के हैं ।
श्रीकृष्ण की पटरानी रुक्मिणी विदर्भ देश की राजकन्या थी। विदर्भ देश के राजा भीष्मक सौम्य स्वभाव के थे किंतु युवराज रुक्मी उग्र प्रकृती का था। उसने अपनी बहन रुक्मिणी का विवाह चेदी देश (आधुनिक बुंदेलखड) के राजा दमघोष के पुत्र शिशुपाल से निश्चित किया। शिशुपाल जरासंध से प्रभावित था, उसी के गुट में था।
इधर रुक्मिणी ने राजदरबार में आनेवाले विविध विद्वानों से, राजप्रतिनिधियों से श्रीकृष्ण की किर्ती सुनी थी और उनके गुणवर्णन से अभिभूत हे कर मन ही मन श्रीकृष्ण का वरण कर लिया था।
रुक्मिणी ने माता पिता को यह बताया भी था किंतु रुक्मी ने किसी की एक न सुनी और शिशुपाल से ही विवाह करने के निर्णय पर अड गया।
रुक्मिणी कुलीन - शालीन - सुसंस्कारी अवश्य थी किंतु भीरु (coward, gullible) नहीं थी। उसने इस समस्या का समाधान ढूँढ लिया।
रुक्मिणी ने एक विश्वासपात्र ब्राह्मण के हाथों श्रीकृष्ण को पत्र लिखकर अपनी स्थिति बतायी व विवाह के लिए अनुरोध किया।
श्रीकृष्ण की शरण में जो भी आते हैं उन्हे वह निराश नहीं करते। इसलिए अपने रथ को शस्त्रसज्ज कर उन्होने विदर्भ देश की ओर प्रयाण किया।
विवाह के पूर्व मांगलिक विधि के अनुसार रुक्मिणी को नगर से बाहर देवी के दर्शन के लिए जाना था।
राजकुमारी के साथ उनकी सखियाँ और अंगरक्षक थे। सेना भी साथ में थी।
रुक्मिणी देवीदर्शन के पश्चात अपने रथ में आरूढ होती इससे पूर्व ही श्रीकृष्ण का रथ विद्युतवेग से आगे आया। उन्होने अपना हाथ आगे बढाया।
श्रीकृष्ण का साँवला - सुदर्शन - मनमोहक हास्ययुक्त मुख देखकर रुक्मिणी ने अपने प्रियतम को पहचाना और उसी क्षण वह श्रीकृष्ण के रथ में चढ गई।
वायुवेग से श्रीकृष्ण ने रथ को मोड लिया। सारथ्य कला में निष्णात (expert) श्रीकृष्ण के रथ के घोडे - शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक - भी उनके प्रिय थे। श्रीकृष्ण के संकेत समझकर उन्होने गति पकड ली।
यह सब क्षणार्ध (fraction of second) में हुआ। रुक्मी व उनकी सेना संभलती इससे पूर्व श्रीकृष्ण का रथ बहुत दूर पँहुच गया था।
क्रोधित रुक्मी ने संभलकर अपनी सेना को पीछा करने का आदेश दिया और विशाल सेना श्रीकृष्ण के रथ की दिशा में दौडने लगी। साथ ही शिशुपाल की सेना भी पीछा करने लगी।
इधर श्रीकृष्ण के विदर्भ देश जाने का समाचार और कारण जानकर बलराम चिंतित हुए थेऔर सहायता के लिए वह सेनासहित श्रीकृष्ण के पीछे चल पडे।
शिशुपाल को, उसकी और रुक्मी की सेनाओं को बलराम व उनकी सेना ने पराजित किया। रुक्मी श्रीकृष्ण से द्वंद्वयुद्ध में हार गए। बलराम और रुक्मिणी के अनुरोध पर उन्होने रुक्मी को जीवित छोड दिया। रुक्मी ने प्रतिज्ञा की थी की रुक्मिणी को लिए बिना वह राजधानी कौंडिण्यपूर नहीं लौटेगा। इसलिए उसने पास के ही एक गाँव में अपना निवासस्थान बनाया और वहीं रहने लगा ।
आगे कृष्ण रुक्मिणी का विवाह संपन्न हुआ।
इस सारे प्रसंग में बलराम सहायता के लिए आएंगे यह श्रीकृष्ण को ज्ञात नहीं था। अपने अभियान की गुप्तता, सुरक्षितता व यश को निश्चित करने के लिए वह अकेले ही निकल पड़े थे। इससे उनका आत्मविश्वास, शौर्य, प्रसंगावधान और युद्धनिपुणता उभरकर आयी हैं।
साथ ही ज्येष्ठ भ्राता बलराम व भावी पत्नी रुक्मिणी के अनुरोध का सम्मान कर रुक्मी को जिवित छोडने का उदाहरण भी हैं जिसमें रुक्मी को क्षमा भी निहित हैं।
रुक्मिणी भाग्यशाली थी और निश्चित रुप से पुण्यवान थी जिन्हे पति के रुप में साक्षात श्रीकृष्ण प्राप्त हुए ।
इसी गाथा को हम आगे बढाएंगे।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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