#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १५७- दि.२८.१०.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १५७: दि. २८.१०.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
परकी आक्रमकों ने हमारा धर्म, संस्कृति, सभ्यता, विचारधारा, जीवनमूल्य, जीवनशैली इन सब की जडों में सेंध लगाने में कोई कसर नहीं छोडी थी।
कदाचित गलती उनकी नहीं थी, हमारी ही थी। उन्होने अपने उद्देश छिपाए नहीं थे। यहाँ अपनी सत्ता प्रस्थापित करना और इस देश को लूटना यहीं उनकी इच्छा थी यह उन्होने अपना घोषणा और कृति से स्पष्ट कर दिया था।
गलती हमारी ही थी कि हमने उन्हे इस भूमि पर पैर जमाने दिए।
हिंदु धर्म कभी भी प्रसारवादी नहीं रहा। हमने अपने धर्म की अच्छाइयों का, महत्ता का गुणवर्णन अवश्य किया हैं, हमारे धर्मग्रंथों का ज्ञानसागर के रुप में बखान भी किया हैं, किंतु हमने कभी भी अन्य धर्मियों को हिंदु बनाने के अभियान नहीं चलाए हैं। शालीनता और अभिजात्य के मानदंडों पर हिंदु धमिर्यों का यह व्यवहार खरा उतरता हैं !
किंतु कहीं ना कहीं हमने शालीनता की इस मर्यादा को अनावश्यक रुप से लंबा खींच लिया। 'आक्रमण ना करना' इसका अर्थ हम 'आक्रमण सहना और शरणागति देना' ऐसा मानते रहे।
हमारे घर में घुसकर चोर यदि हमारी संपत्ति लूटने लगे तो विरोध करना आक्रमण नही कहलाता हैं। और सुरक्षा के उपायों को निष्फल कर जब आतंकवादी आघात करते हैं तो आँसू बहाकर रुकना नहीं होता हैं , Surgical strike करने पडते हैं जैसे २०१६ में हमारी सेना ने किए थे !
इतिहास कालीन भारत में कदाचित ऐसी मानसिकता कम थी। दुर्भाग्य से, छत्रपती शिवाजी महाराज, राणा संग (संग्रामसिंह - महाराणा प्रताप के दादाजी) महाराणा प्रताप , पृथ्वीराज चौहान, रानी दुर्गावती इनकी मानसिकता वाले राज्यकर्ताओं की, सरदारों की कमी थी। अनेकों ने स्वार्थवश आक्रमकों का ही साथ दिया।
परिणाम ?
इस देश में देवालय व प्रार्थनास्थल तोडे गए, उनको अनाधिकार छीन लिया गया, हिंदु धर्मपालन पर कडे प्रतिबंध लागाए गए, फिर भी सनातनी हिंदु ही बने रहना है तो जिझिया कर लगाया गया।
गलती उनकी नहीं थी, हमारी थी !
और इतिहास की गलतियों से सीख लेकर अपना दृष्टीकोन और वर्तन बदलनेवालों के भाग्य में ही उज्वल भविष्य होता हैं !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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