#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १५० - दि. २१.१०.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १५०: दि. २१.१०.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
साधारण व्यक्ति के लिए संन्यास लेने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती है।
बढती आयु के साथ प्राप्त परिपक्वता से जब संन्यासाश्रम का निर्णय लिया जाता हैं तब जीवन के सभी सुखोपभोगों का आनंद प्राप्त करने के पश्चात तृप्ति से लिए गए निर्णय को निभाते समय उस व्यक्ती मन भी शांत रह पाता है।
अल्प आयु में जब संन्यास ग्रहण किया जाता हैं तब भौतिक जीवन के किन सुखों का त्याग किया जा रहा हैं इसकी कल्पना उस व्यक्ती को नहीं होती है। अपरिपक्व मन कदाचित उस त्याग की गहराई को समझने में सक्षम नहीं होता है और पढे - सुने आदर्शों से प्रभावित होकर ऐसे निर्णय लेने की तीव्र इच्छा होती है।
यद्यपि ऐसे निर्णय निभाए जाते हैं किंतु इसमें कुछ व्यक्तियो के लिए 'समाज क्या कहेगा' इस विचार का दबाव भी हो सकता हैं। वैराग्य की भावना अति उत्कटता से मन में उत्पन्न होना इतना भी सरल - सहज नहीं है। इसलिए हमारे धर्म में भौतिक जीवन के सुखोपभोगों को तुच्छ नहीं माना गया है। उल्टे संत, सत्पुरुष तो पुनःपुन्हा सावधान करत हैं कि जीवन के भोगों को हमारे मन का स्वामी नहीं बनने देना है, बल्कि उन सब भोगों का स्वामी बनकर स्वेच्छा से और संयमपूर्वक उनका आनंद लेना हैं। इससे वासनाओं का हमपर अधिकार नहीं बन पाता हैं, पतन का मार्ग नहीं खुलता हैं, बल्कि हम जीवन के सुख प्राप्त कर तृप्त होते हैं।
गीता के तीसरे अध्याय में भगवान् भी कहते हैं कि अपनी समस्त इंद्रियों को अपनी इच्छानुसार कार्यरत करना कर्मयोग हैं ❗
और भगवान तो कर्मयोग को ही प्रधान मानते हैं। कर्म का त्याग कर संन्यास लेने की अनुमति श्रीकृष्ण नहीं देते हैं। सृष्टी के चलनवलन व अस्तित्व के लिए कर्म अत्यावश्यक हैं यह गीता में पुनःपुन्हा अधोरेखित किया गया है। वह कर्म में आसक्ति का निषेध करते है और कर्मफल के मोह को त्याज्य मानते हैं किंतु कर्म छोडकर संन्यास लेने को उन्होने कर्तव्यचुत होना ही कहा है।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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