#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १४७ - दि. १८.१०.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १४७: दि. १८.१०.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
पर्व और त्योहारों पर पूजा करना सनातन हिंदु धर्म का अभिन्न अंग है। ऐसी पूजाओं का दृश्य अत्यंत विलोभनीय होता है।
सजाई हुई चौकीपर स्थापित मूर्ति, देवप्रतिमा अथवा प्रतिक ..
अल्पना से सुंदर सजावट ..
फुलों के सुंदर हार व अनेकविध फूल और बेल - तुलसी - दुर्वा अर्पित पूजा देखकर मन प्रसन्नता से भर जाता है।
ऐसी पूजा करनेवालों के मन में भक्ति का भाव होता है। कभी कभी विशेष याग, महारुद्र, गुरुपौर्णिमा आदि आयोजन भव्य रुप में किए जाते है जिसमे धन और कष्ट दोनो ही अधिक मात्रा में आवश्यक होते है।
मनुष्य स्वभाव पर विचार करें तो ऐसे आयोजन के लिए करनेवाले के मन में थोडा अहंभाव निर्माण होना संभव है। 'मैं ही हूँ जो इतना भव्य आयोजन अच्छी प्रकार से कर लिया, सब तो नहीं कर पाएंगे' अथवा 'हम तो नियमित रूप से यह करते है, ऐसा सब तो नहीं करते हैं' ऐसे विचार मन में आ सकते हैं।
अपने ऐश्वर्य का प्रदर्शन करने की इच्छा, स्वयं की क्षमता का अहंकार आदि भावनाएँ सामान्य मनुष्य के लिए असंभव नहीं हैं।
सनातन हिंदु धर्म में इसका भी विचार किया गया है और इसके लिए एक अत्यंत सुंदर उपाय भी हमारी पूजाविधि का भाग है !
पूजा प्रारंभ करते समय विधिविधान से पूजा करने का संकल्प किया जाता है और पूजा पूर्ण होने पर हाथ में पानी लेकर 'यथाशक्ती - यथाज्ञानेन - यथामिलित उपचार द्रव्य (जो उपलब्ध हो पायी ऐसी सामग्री)' से पूजा की हैं ऐसा देवता को विनम्रता से बताया जाता है। आगे तत्काल 'न ममं' कहा जाता है। अर्थात इस पूजा का जो पुण्य मिला है वह न ममं = मेरा नहीं है (पूजा के लिए इष्ट देवता का है) यह कहते हुए हाथ से पानी छोड दिया जाता हैं।
हमारे धर्म में किसी को कुछ देने का उच्चार कर हाथ से पानी छोडने का अर्थ उस वस्तू से अपना मन दूर करना और उसे दूसरे को अर्पण करना हैं।
सोचिए, इतना अच्छा आयोजन, उसके लिए शरीर कष्ट और धन का व्यय करने के बाद करनेवाले के पास क्या बचता है ?
पूजा का पुण्य भी नहीं❗
अर्थात आसक्ती नहीं रखनी है। दृष्टी जो देख रहीं है उस आयोजन का श्रेय भी त्यागना है। पूजा दृश्य तो है, किंतु इसमें 'मेरा' कुछ भी नहीं है यह मनुष्य को तत्काल ही समझाया जाता हैं।
'दृश्य' से आसक्ति छुडाने के यह मार्ग कितने मनोज्ञ हैं !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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