#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १२६ - दि. २७.०९.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १२६: दि. २७.०९.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

धर्मरक्षण को जीवन की आकांक्षा मानने से हमें अपने  अनेक प्रश्नों के उत्तर मिलते हैं और जीवन के लिए मार्ग भी स्पष्ट हो जाता है।
परंतु व्यक्तिगत मोह अधःपतन का कारण बनता है, सन्मार्ग से दूर करता है और ईशप्राप्ती में रुकावट बनता हैं !

यही सब कृपाचार्य के साथ हुआ। 
उनका पालनपोषण राजा शान्तनु ने किया था। इसलिए कदाचित उन्होने यह मान लिया था कि वह कुरु सिंहासन की सेवा से बंध गए हैं। और उनके लिए सेवा का सबसे सरल मार्ग यह रहा होगा कि राजा शान्तनु के पुत्र देवव्रत भीष्म के आदर्शों के प्रति अपनी भी निष्ठा रखें।
इसलिए सम्राट पाण्डु के असमय वनगमन के पश्चात उन्होने धृतराष्ट्र को अपनी निष्ठा समर्पित की। जैसे भीष्म ने अपनी विवशता मानकर धृतराष्ट्र व उसके पुत्रों का विरोध नहीं किया वैसेही कृपाचार्य भी कुरु सिंहासन की नहीं, बल्कि उसपर अधर्म से कब्जा कर बैठे व्यक्तियों की चाकरी करते रहें !

आचार्य द्रोण को जब भीष्म ने हस्तिनापुर के राजकुमारों की शिक्षा का दायित्व सौंपा तब कदाचित कृपाचार्य अत्यंत प्रसन्न हुए। क्योंकि उनकी प्रिय भगिनी कृपी अपने पुत्र सहित पुनः हस्तिनापुर आ गई थी।
कृपाचार्य अविवाहित थे इसलिए उन्हे अपनी भगिनी के पुत्र अश्वत्थामा से अत्यंत प्रेम था।
यह स्वाभाविक था और ऐसे ही होना भी चाहिए।

परंतु भागिनेय से प्रेम का अर्थ उसे मार्गदर्शन करना होना चाहिए, उसकी अनैतिक कृतियों का मूक साक्षी बनना नही !

द्रोण अपनी पूर्व निर्धनता के कारण संपत्ति के प्रति आसक्ति रखते थे। संभवतः इसिलिए उनका झुकाव सत्ताकेंद्र की ओर था। इधर अश्वत्थामा भी दुर्योधन की संगत में रहने लगा।

कृपाचार्य को इसकी जानकारी अवश्य थी। फिर भी यदि उन्होने दोनों को समझाने की आवश्यकता नहीं देखी तो वह उनकी भूल थी और आवश्यकता देखकर भी कृति नहीं की तो यह उनका घोर अपराध था !

नाग के काटने पर घाव के उपरी भाग में कसकर पट्टी बांधी जाती हैं जिससे रक्त द्वारा विष पूर्ण शरीर में प्रवाहित ना हो। औषधि तो देनी ही होगी परंतु पट्टी बांधना अत्यावश्यक होता हैं ! अन्यथा पूर्ण शरीर विषैला बन जाता हैं।

अश्वत्थामा के साथ यहीं हुआ।
पिता दुर्योधन से उसके मैत्री(❓ ) संबध को लाभकारी मानते रहे और मातुल कृपाचार्य ने कदाचित इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया।
परिणाम ?
अश्वत्थामा के घोर अपराध..

उसने कुरुक्षेत्र पर युद्ध समाप्ति के दिन ही सोते हुए धृष्टद्युम्न और सारे पाण्डवपुत्रों की धोखे से, उनके निद्राधीन अवस्था में हत्या कर दी, वह भी मरणोन्मुख दुर्योधन के आदेश पर.. 

यह युद्ध के नियमों का और और ब्राह्मण कुल की मर्यादा का भी उल्लंघन था। सोए हुए शत्रु पर उसके शिविर में घुसकर रात के अंधेरे में उनकी हत्या करना घृणास्पद क्रूरता का कृत्य हैं ! और इस समय कृपाचार्य अश्वत्थामा के साथ थे।  

इसके पश्चात अश्वत्थामा ने पाण्डवों के कुल पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया और नियम के विरुद्ध किया। ब्रह्मास्त्र चलाने का अधिकार उसे ही है जो उसे वापस बुला सकता हैं क्योंकि कोई व्यक्ति दूसरे का ब्रह्मास्त्र वापस नहीं बुला सकता हैं। अश्वत्थामा को ब्रह्मास्त्र वापस बुलाने का ज्ञान नहीं था। और यह जानते हुए भी उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया।

कृष्ण के कारण पाण्डवों के वंश की अर्थात अभिमन्यु व उत्तरा के पुत्र परिक्षित की रक्षा हो पायी थी। परंतु इससे अश्वत्थामा के अपराध की क्षमा नहीं हो सकती हैं !

इससे स्पष्ट हैं कि कृपाचार्य स्वयं सदाचारी थे, किंतु वे समय समय पर कर्तव्यच्युत होते रहे, उन्होने अधर्म को नहीं रोका ।

ऐसी व्यक्ति कृष्णकृपा की अधिकारी नहीं हैं। 
कृष्ण धर्म की रक्षा के लिए उपदेश भी करते हैं और शस्त्र भी उठाते हैं और उनके पदचिन्हों पर चलनेवाले ही उनकी कृपा पा सकते हैं !

यह हमारे लिए भी सत्य हैं ❗❗❗

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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