#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १०० - दि. ०१.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १०० : दि. ०१.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
युद्ध में विजय के लिए शक्ती और शस्त्र संचालन का कौशल्य आवश्यक होता हैं, साथ ही अनेक बार चातुर्य की भी आवश्यकता होती है।
श्रीकृष्ण की चतुराई का एक महत्वपूर्ण उदाहरण हैं कालयवन की मृत्यु।
जरासंध श्रीकृष्ण से युद्ध में पुनःपुनः पराजित हो रहा था। उसने कालयवन को अपनी ओर से युद्ध करने के लिए मनाया।
कालयवन एक यवन राजा था। जरासंध जैसा ही क्रूर और अत्याचारी था। उसे शिवजी का वरदान था कि उसकी मृत्यु किसी भी शस्त्र / अस्त्र से नहीं हो पाएगी।
उसने प्रचंड संख्या में सेना लेकर मथुरा पर चढाई की। इतने विशाल सेनासागर के साथ मथुरा की सेना का युद्ध संभव ना देखकर श्रीकृष्ण ने उसे द्वंद्वयुद्ध (केवल दो योद्धाओं के बीच युद्ध) के लिए ललकारा।
उसने श्रीकृष्ण के साथ युद्ध प्रारंभ किया।
बहुत समय तक युद्ध के पश्चात श्रीकृष्ण ने भागना प्रारंभ किया। उन्हे युद्धभूमि छोड भागते देखकर कालयवन भी उनके पीछे भागने लगा।
श्रीकृष्ण दौडते हुए उसे एक पहाड पर ले गए। यहाँ एक गुफा में राजर्षी मुचकुंद सो रहे थे।
इन्होने देव और राक्षसों के युद्ध में देवों की सहायता की थी और इसी कारण देव पक्ष विजयी हो पाया था।
इस युद्ध में अत्यंत थकान के कारण इंद्र ने उन्हे विश्रांती के लिए प्रगाढ निद्रा का वरदान दिया था और किसी ने भी उनकी निद्रा भंग की तो उनकी दृष्टी पडते ही वह व्यक्ति अग्निसात हो जाएगा (जलकर राख हो जाएगा) ऐसा यह वरदान था।
श्रीकृष्ण उसी गुफा में गए और अपना उत्तरीय (कंधे पर ओढने वाला वस्त्र = शाल = shawl) चादर समान राजर्षी मुचकुंद पर ओढ दी और स्वयं कही और छुप गए।
क्रोधित कालयवन दौडते हुए गुफा में प्रविष्ट हुआ।
उसने श्रीकृष्ण का उत्तरीय ओढकर सोए व्यक्ति को देखा। उसने सोचा की उससे भयभीत होकर श्रीकृष्ण छुपे बैठे हैं।
उसने आवेश में सोए व्यक्ति को लात मारी।
मुचकुंद नींद से जागे। इतने बीभत्स प्रकार से उन्हे जगाने के कारण उन्होने क्रोध से आँखे खोली।
तत्काल कालयवन जलकर भस्म हुआ।
तभी श्रीकृष्ण राजर्षी मुचकुंद के सामने प्रविष्ट हुए। साक्षात विष्णु अवतार को सामने देख वह भावभावना से गद्गद् हुए और उन्होने श्रीकृष्ण को प्रणाम किया।
प्रसन्न होकर प्रभु ने उन्हे मोक्ष प्रदान किया।
यह था इतिहास। अब हम इसमें निहित कृष्ण की युद्धनिती पर विचार करेंगे।
जरासंध को पुनःपुनः जिवित छोडना और उसी के माध्यम से अन्य अत्याचारी राजाओं का विनाश करना यह कृष्ण की चतुराई और युद्धनिती का उत्तम उदाहरण है।
कालयवन की सेना से मथुरा की सेना का संहार टालने के लिए उसे द्वंद्वयुद्ध के लिए ललकारना इसमे श्रीकृष्ण की चतुराई हैं, मानवी जीवन के प्रति आस्था और करुणा हैं और युद्धनिती भी है।
इस युद्ध में रणभूमि छोड़कर भागने के कारण श्रीकृष्ण को 'रणछोडदास' (रण + छोड + दास = युद्धभूमि छोडकर भागनेवाला ) कहा जाता है। किंतु ऐसे निरर्थक अपमान का विचार कृष्ण नहीं करते हैं !
अत्याचारी के विनाश के लिए सबकुछ समर्थनीय हैं यही उनकी भूमिका थी।
प्रत्येक समय शक्ती और युद्धकौशल्य काम नहीं आता हैं, युद्धनिती में चतुराई भी महत्वपूर्ण होती है इसका यह उत्तम उदाहरण हैं।
श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व के विविध पहलुओं का यह एक अनुकरणीय भाग है!
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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