#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १२३- दि. २४.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १२३: दि. २४.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
कुटुंब की एकता को संभालकर भी श्रीकृष्ण द्वारा धर्म और न्याय की रक्षा करने का दूसरा प्रसंग महाभारत के युद्ध के संबध में है।
बलराम का झुकाव दुर्योधन की और था। किंतु वह पाण्डवों के प्रति श्रीकृष्ण की भावनाओं से परिचित थे। वैसे श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के प्रति रोष प्रकट नहीं किया था किंतु बलराम जानते थे की श्रीकृष्ण की कौरव पक्ष से लडने की कोई संभावना नहीं हैं।
वह ज्येष्ठ भ्राता थे परंतु दोनों के संबध ऐसे नहीं थे की वह श्रीकृष्ण पर अपना निर्णय थोपेंगे। श्रीकृष्ण ने आज्ञाकारी - विनम्र कनिष्ठ बंधु की मर्यादा का सदैव पालन किया था यद्यपि किया उन्होने वहीं जो आवश्यक और न्याय्य था ! परंतु चतुराई से किया, लड - झगडकर नहीं किया।
बलराम ने मध्यम मार्ग सोचा कि वे दोनो युद्ध में भाग ही ना लें ! यानि 'न रहेगा बांस ना बजे गी बाँसुरी'।
इधर श्रीकृष्ण ने स्वयं तो युद्ध में शस्त्र ना उठाने की घोषणा कर दी परंतु दुर्योधन को अपनी नारायणी सेना दे दी !
अब बलराम क्या करें ?
कृष्ण ने तो उनके आज्ञा का पालन किया था। वह युद्ध नहीं करेंगे बल्कि अकेले, निःशस्त्र अर्जुन के सारथि बनेंगे !
कौन कह सकता हैं कि सारथि की भूमिका युद्ध का पलडा पलटाने जितनी महान होती है ?
और जब सशस्त्र, युद्धकुशल नारायणी सेना श्रीकृष्ण ने सहजता से दुर्योधन को दे दी थी तब बलराम यह भी नहीं मान सकते थे या कह सकते थे की श्रीकृष्ण दुर्योधन का अहित कर रहें हैं अथवा पाण्डवों के विजय के लिए दाँवपेच लडा रहें है !
इसलिए, निःशस्त्र ही सही परंतु युद्धभूमि में उपस्थित रहने का श्रीकृष्ण का निर्णय बलराम को अच्छा तो नहीं लगा था, परंतु वह विरोध नहीं कर पाए !
श्रीकृष्ण ने यादव कुल को टूटने से बचाया और धर्म की रक्षा और न्याय के विजय की व्यवस्था भी कर ली !
मतभेदों पर वाक् चातुर्य से मात करना कोई श्रीकृष्ण से सीखे 🙏🏼
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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