#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १२०- दि. २१.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १२०: दि. २१.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
अपनी हीनभावना के कारण कुसंगति की ओर झुकना और स्वयं के विनाश को आमंत्रित करना इसका उदाहरण हैं कर्ण !
वास्तव में कर्ण के सम्मुख विदुर का उदाहरण था। वह दासीपुत्र थे इसलिए धृतराष्ट्र व पाण्डु के भ्राता होने पर भी उन्हे राजकुल में स्थान नहीं मिला था।
परंतु विदुर ने इसके लिए कभी भी अपने आप को दुर्भाग्यशाली नहीं माना था। व्यासदेव के पुत्र होने से वह संतुष्ट थे। उन्होने ज्ञान प्राप्ती और धर्मपालन को अपना जीवन समर्पित कर दिया था। ना धृतराष्ट्र ने ना दुर्योधन ने उन्हे उचित सम्मान दिया था अथवा उनकी बात मानी थी परंतु विदुर इससे निर्लिप्त रहकर अपने मार्ग पर चलते रहे।
धृतराष्ट्र की राजसभा में वह पाण्डवों के हितैषी के रूप में उपस्थित होते थे।
वह योद्धा नहीं थे इसलिए कुरुक्षेत्र के युद्ध में उनका सहभाग नहीं था परंतु हस्तिनापुर की राजसभा में वह धृतराष्ट्र और दुर्योधन का मन प्रसन्न करने का हेतु रखकर कभी भी नहीं बोलते थे, वह न्याय और धर्म की बात करते थे।
बहुत संभव हैं कि हस्तिनापुर की राजसभा में जो चर्चा अथवा निर्णय होते थे अथवा उन्हे अपने सूत्रों से जो भी जानकारी मिलती होगी उसका उन्होने पाण्डवों के हित के लिए उपयोग किया होगा।
विदुर को ना धन का मोह था, ना सत्ता की आकांक्षा थी। इसलिए वे कभी भी अन्याय का साथ देने के लिए विवश भी नहीं हुए।
ज्ञानी होने के कारण वह श्रीकृष्ण का सत्य स्वरूप भी जानते थे इसलिए जहाँ विदुर के घर में श्रीकृष्ण का आदर से स्वागत होता था वहीं श्रीकृष्ण भी विदुर की विद्वत्ता और सत्शीलता को मानकर उनसे विनम्र और आत्मीय व्यवहार करते थे।
भीष्म और कर्ण द्वारा आपनेआप को प्रतिज्ञाओं में बांध लेने के अपने अपने कारण थे परंतु विदुर हस्तिनापुर की राजसभा में मंत्री होनपर भी मन से स्वतंत्र रहें !
उन्होने सदैव सत्य कहा ही नहीं, सत्य का साथ भी दिया था !
👆🏼यह हैं धर्म जो मनुष्य का मार्गदर्शन कर उसे उन्नति की ओर अग्रेसर करता है !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें