#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १०७ - दि. ०८.०९.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १०७: दि. ०८.०९.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

श्रीकृष्ण की न्यायबुद्धी और नातेसंबंधों के पार जाकर केवल सत्य और धर्म की प्रतिष्ठापना का आग्रह इसके विविध उदाहरण उनके चरित्र में हैं। 

आज के युग में भी युरोप के विविध राजघरानों में (जैसे इंग्लैंड, स्वीडन, नॉर्वे, डेन्मार्क नेदरलॅण्डस्, बेल्जियम, लक्झेंबर्ग, मोनॅको, लिचनस्टाइन  और अब जिन देशों में राजा / रानी की सत्ता नहीं हैं परंतु पूर्व में थी ऐसे रशिया, रोमानिया, बल्गेरिया, जर्मनी, इटली, पोर्तुगाल, ग्रीस आदि) आपसी नातेसंबध पाए जाते हैं तो सोचिए की उस युग में जब भारत में ही विभिन्न छोटे - बडे राज्य हुआ करते थे उनके नातेसंबध कितने जटिल रहे होंगे।
परंतु श्रीकृष्ण ने नातेसंबधों के इस मायाजाल से भी अपना कर्तव्य ही महत्वपूर्ण माना हैं।

आवश्यकतानुसार अपराधियों पर शस्त्र उठाना, उन्हे उनके कर्मों के अनुसार दण्ड देना इसमें कृष्ण कभी भी नहीं चूंके थे, भले ही वह अपराधी उनके सगेसंबधी क्यों ना हो ❗

उदाहरण के लिए, शिशुपाल श्रीकृष्ण की बुआ सुतसुभा का पुत्र था। परंतु वह पूर्णतः जरासंध से प्रभावित था और उसी के समान विलासी, अत्याचारी और क्रूर था। शिशुपाल द्वारा अन्याय होने पर कृष्ण द्वारा दण्डित करने के दो प्रमुख उदाहरण हैं।

पहला, रुक्मिणी की इच्छा के विपरित अपनी सत्ता व जरासंध का समर्थन इस आधारपर रुक्मी से कहकर विवाह की निश्चिति।
शिशुपाल क्या रुक्मिणी की सात्विक वृत्ती नहीं जानता होगा?
किंतु लक्ष्मी के गुणों से युक्त सुंदरी राजकन्या का मोह उसे था। वैसे भी शिशुपाल की वृत्तीवाले पुरुषों के लिए स्त्रियां भेड - बकरियों जैसी ही होती हैं।
परंतु रुक्मिणी ने जब श्रीकृष्ण से सहायता की याचना की तब श्रीकृष्ण ने शिशुपाल से नातेसंबध के विचार से उस असहाय्य कन्या को निराश नहीं किया था।

यहाँ एक बात हमें स्पष्ट रुप से समझनी होगी की इसका कारण श्रीकृष्ण का सुंदरी राजकन्या के प्रति मोह नहीं था ❗

जो श्रीकृष्ण गीता के माध्यम से यह बताते हैं कि 'मनुष्य जैसे पुराने वस्त्र बदलते हैं, उसी के समान आत्मा शरीर बदलती है', वह कृष्ण क्या शारीर सौंदर्य की अभिलाषा रखेंगे ?
और यदि हम भी श्रीकृष्ण के इस👆🏼 वचन को समझने का प्रयास करें तो एक सत्य अनावृत्त (open) होता हैं। वह यहीं हैं कि शरीर का सौंदर्य मात्र आभास हैं....
काल का, समय का कठोर हथौडा शरीर सौंदर्य को छिन्न करता हैं....
वैसे यौवन में जब शरीर का सौंदर्य परमोच्च बिंदु पर होता है तब भी वह उपरी (superficial) ही होता है ! व्यक्ति की त्वचा कांतिमान, आँखे - नासिका - होंठ आदि अवयव विविध सौंदर्यगुणों से युक्त हो सकते हैं परंतु त्वचा के अंदर क्या हैं ? 
अवयवों की जटिल श्रृंखला....
अस्थि - मज्जा - रुधिर (Bone, muscles - blood) से  उलझा हुआ एक यंत्र हैं मानव शरीर...

👆🏼 यह सुनने - पढने में अत्यंत कठोर प्रतित हो सकता हैं परंतु सत्य कठोर ही होता हैं। 
..और बढती आयु के साथ घटता सौंदर्य और शक्ती के साथ श्रीकृष्ण के वचन का अर्थ समझना संभव होता हैं !

इसी से यह स्पष्ट होता हैं कि श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी - हरण इसलिए नहीं किया हैं कि वह स्त्री से मोहित थे, उन्होने अन्यायी को परास्त किया (defeated) और एक कन्या के दमनपूर्वक (forced) हो रहे विवाह को रोका !
कृष्ण स्वयं लोभ नहीं रखते, वह अत्याचारित को मुक्त करने के लिए कार्य करते हैं ❗

शिशुपाल के ही संबध में दूसरा उदाहरण उसके वध का हैं। 
इंद्रप्रस्थ नगरी में राजसूय यज्ञ के समय श्रीकृष्ण के लिए अनर्गल वार्ता (irrelevant & insulting) करनेवाले शिशुपाल का वध श्रीकृष्ण ने किया। उसमें भी उन्होने शिशुपाल के १०० अपराधों की क्षमा करने का उसकी माता को दिया हुआ वचन पूर्ण किया और १०० अपराधों की सीमा का शिशुपाल ने उल्लंघन किया तब उसका वध किया। उल्लेखनीय है कि शिशुपाल का अंतिम अनर्गल प्रलाप रुक्मिणी के प्रति अपमानजनक वक्तव्य करने का था और श्रीकृष्ण स्त्री का अपमान सहन नहीं करते है !
यह घटना इस सत्य की ओर निर्देश करती हैं कि श्रीकृष्ण केवल न्याय के लिए कार्यरत हैं, वह नातेसंबधों की दलदल में फँस कर अन्यायी की रक्षा नहीं करते हैं❗

श्रीकृष्ण की यह पद्धति देखिए और आजकल की राजनिती देखिए !
उदात्त तत्व हमारी संस्कृति में हैं, उसके उदाहरण भी हैं ! परंतु हम ही उन्हे भूल जाएंगे तो पतन ही होगा।

इसलिए हमें चाहिए की आधुनिक भारत के नागरिकों का कर्तव्य समझ कर हम देशहित में कार्य करनेवालों का साथ दें क्योंकि हिंदु संस्कृति में ऐसी वृत्ती का ही जयजयकार होता हैं ❗

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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