#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ११४- दि. १५.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ११४: दि. १५.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
पाण्डवों की धर्मनिष्ठा के अनेक उदाहरण हैं।
मूल रूप से वह निर्लोभी, न्यायप्रिय और सदाचारी थे। साथ ही श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन के कारण उनकी सात्विकता में वृद्धीं ही होती रहीं।
यद्यपि क्षत्रियों के लिए आवश्यक रजोगुण (तामसी वृत्ती, युद्ध के लिए स्वीकृती आदी) का उन्होने त्याग नहीं किया था परंतु अत्यावश्यक होने पर अथवा दूसरा मार्ग ही ना होनेपर ही उन्होने रजोगुण को हावी होने दिया। अन्यथा अपने जीवन में उन्होने अधिकांशत: विपत्तियों का ही सामना किया हैं जिसमें प्रियजनों से दीर्घकाल तक बिछुडने की अनेकानेक घटनाएँ थी।
सबसे पहला प्रदीर्घ खण्ड था उनके बारह वर्षों के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास का।
उस युग में आधुनिक युग जैसे संपर्क साधन नहीं हुआ करते थे (phone /email आदि)। इसलिए सूचनाओं का आदानप्रदान दूतों के माध्यम से होता था।
परंतु वन में उन्हे दूत कैसे उपलब्ध हो सकते थे ?
कदाचित वन से गुजरनेवाले यात्रियों से ही बाहरी समाचार मिलते होंगे ..
परंतु प्रियजनों के क्षेमकुशल की वार्ता कैसे मिल पाती होगी ?
कदाचित राजगृह व वन सभी जगहों पर विचरण करनेवाले ऋषियों से ?
परंतु यह कोई निश्चित और नियमित साधन तो नहीं था। इसलिए संभावना (possibility) यही है कि वनवास - अज्ञातवास की दीर्घ अवधि में उन्हे अपनी माता - पत्नी - पुत्र - अन्य स्वजनों के संबध में सुचनाएँ कई कई दिन / मास तक नहीं मिल पाई होंगी।
कुंती हस्तिनापुर में विदुर के घर में रह रहीं थी। इसलिए पाण्डव माता के लिए चिंतित रहते होंगे क्योंकि उनका अपनी माँ से नाता प्रेम और भक्ती का था।
हस्तिनापुर में रहने का निर्णय कुंती ने कदाचित बहुत सोचसमझ कर लिया था ताकि पाण्डव यह कभी ना भूले की उनकी माता एक प्रकार से शत्रु के प्रदेश में है। अन्यथा अपनी विरागी (संन्यस्त) वृत्ती के चलते वह हस्तिनापुर का राज्य वापस लेने का तो क्या, वहाँ लौटने का विचार भी छोड देते। परंतु कुंती धर्म का विजय चाहती थी, अधर्म की प्रतिष्ठापना नहीं !
साथ ही कदाचित उनका यह भी विचार हो सकता हैं कि उनके हस्तिनापुर में विराजमान रहने के कारण दुर्योधन सदैव स्मरण रखे की उसे पाण्डवों का सामना कभी तो करना ही होगा !
कुंती क्षत्राणी थी। क्षत्रियों का धर्म हैं न्याय का रक्षण करना और अधर्म का विनाश करना।
केवल क्षमाशील होना साधु - संन्यासियों का गुण हो सकता हैं, क्षत्रियों का नहीं !
परंतु कुंती में क्षत्रियोचित रजोगुण उचित मात्रा में था। अन्यथा वे परम दयालु, धैर्यशालिनी और क्षमाशील ही थी।
पाण्डु की शारीरीक असमर्थता के बावजूद वह संपूर्ण निष्ठा से पत्नीधर्म निभाती रही !
नियोग के तीन प्रसंगों के पश्चात अपने वर उन्होने अपनी सौतन को दिए !
माद्री के दोनो पुत्रों का पालनपोषण उन्होने अपने तीन पुत्रों के समान ही किया, कभी कोई भेदभाव नहीं किया !
महाभारत के युद्ध के पश्चात, पुत्रों की मृत्यु से दुखी धृतराष्ट्र व गांधारी ने जब वानप्रस्थाश्रम के लिए वनगमन का निर्णय लिया तो अपने विजयी पुत्रों के वैभवशाली राज्य का मोह कुंती को बांध नहीं पाया। अपने जेठ - जेठानी की सेवा को धर्म मानकर वह भी उन्हीं के साथ वन में गई और कभी लौटकर नहीं आयी !
मनुष्य कहाँ से ऐसा धैर्य और उच्च चारित्र्य प्राप्त करता है ?
जिसे भौतिक जीवन में ही रस है उससे तो यह सब होने से रहा !
तो स्पष्ट है की ईश्वरभक्ती, धर्म का ज्ञान और उच्च कोटी की धर्मनिष्ठा ही मनुष्य को ऐसे गुणों से मंडित करती हैं ❗
माता के ऐसे ही गुण पुत्रों में भी प्रतिबिंबित हुए थे जिनपर हम विचार करते रहेंगे। यह इसलिए आवश्यक हैं कि कई बार हम अपनेआप को दुर्देवी मानते है, हमे लगता हैं कि विपदाएँ और संकट हमें गोद लिए बैठे हैं। इस विचार के हावी होने पर हम संतुलन खो सकते है और अधर्म का समर्थन कर सकते है।
इसलिए ऐसी 👆🏼 गाथाओं पर मनन करना चाहिए जिससे हम यह समझ पाएँ की संकट और समस्याएँ जीवन का अविभाज्य भाग हैं, जीना उनके साथ ही है, फिर भी भक्ती और धर्मनिष्ठा पर कोई खरोच नही आने देनी हैं !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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